किसानों की पीड़ा का जीवंत दस्तावेज है संदीप मील की पुस्तक ‘बोल काश्तकार’

(सुधांशु गुप्त/Sudhanshu Gupta)

हिंदी कहानी में पिछले कुछ वर्षों से एक बात साफ दिखाई दे रही है. वह यह कि हिंदी कहानी में अब भव्यता, परिवेश में वैभव और कथ्य में भी नयेपन के नाम पर, आधुनिकता के नाम पर ऐसी चीजें शामिल होती जा रही हैं जिनका आम आदमी-हाशिये के आदमी से कोई सरोकार नहीं है. दिलचस्प बात है कि इन कहानियों के किरदारों के नाम भी स्वाभाविक और देसी नहीं होते बल्कि कृत्रिम से दिखाई पड़ते हैं. इनकी भाषा भी साफतौर पर ‘आर्टिफिशियल’ दिखाई देती है. ये कहानियों का सच है. ठीक उसी तरह जिस तरह समाज में कृत्रिम भव्यता का राग-आलापा जा रहा है. कहा जा सकता है कि कहानी से भी आम आदमी लुप्त होता जा रहा है. तर्क वही घिसा-पिटा है, इस तरह की कहानियों को कौन पढ़ता है. तो धीरे-धीरे आम आदमी मुख्यधारा से गायब हो गया. हालांकि, अब भी कुछ लोगों के लिए आम आदमी की चिंताएं मूल में हैं और वे उस पर लिख भी रहे हैं.

हाल ही में संदीप मील का एक कहानी संग्रह आया है ‘बोल काश्तकार’. संदीप मील उन कथाकारों में हैं, जो गांव से निकलकर शहर में आए, लेकिन शहरी नहीं हुए. उनके भीतर गांव सांस ही नहीं लेता रहा बल्कि उनके अनुभवों का हिस्सा बना रहा. वह शहर में रहते हुए भी गांव को देखते हैं. और यह देखना पर्यटक की तरह गांव देखना नहीं है.

इस संग्रह की कहानियां बताती हैं कि संदीप मील गांव से कितने गहरे जुड़े हैं. वे किसान जीवन की महीन से महीन बात जानते और समझते हैं. यह अनायास नहीं है कि उन्होंने अपनी किताब समर्पित की है ‘उन किसानों के नाम जो खेती बचाने के लिए कुर्बान हो गए’.

संग्रह की पहली ही शीर्षक कहानी ‘बोल काश्तकार’ खेती से जुड़ी तीन पीढ़ियों के जरिये काश्तकार का नया आख्यान लिखती है. कहानी दादा जागेराम से शुरू होकर नीर तक पहुंचती है. ठेठ ग्रामीण भाषा में किसानों का जीवन दर्शन भी यहां दिखाई देता है. वह लिखते हैं- “जिन्दगी में एक बात गांठ बांध लेना कि काश्तकार राम के मारे से नहीं मरता, राज के मारे से मर जाता है…जब से ट्रेक्टरों से बुवाई होने लगी तो खेजड़ी के पेड़ ही खत्म हो गए…इंसान की तरह खेत को भी लत लगती है, अगर एक बार विदेशी खाद की लत लग गई तो गोबर की खाद असर नहीं करेगी…”

इस कहानी में किसानी जीवन की सारी तकलीफें दिखाई देती हैं. कीटनाशकों की वजह से चिड़ियों का लुप्त हो जाना, जानवरों का खत्म होते चले जाना, औरतों के गहने उतरते चले जाना. किसानों का मजदूरों में बदलते जाना. कम्पनी का किसानों की जमीनों को हड़पना और किसानों का आंदोलन. नायक नीर को हिंसा भड़काने के आरोप में जेल भेजा जाना. लेकिन फिर भी उसका यह सवाल वहीं खड़ा है, काश्तकार बोल रहा है ना. कहीं वह चुप तो नहीं हो गया. यह कहानी किसानों की पीड़ा का जीवंत दस्तावेज है.

कोई ग्रामीण जब शहर आता है तो बहुत से डर भी अपने साथ लाता है. ‘पदयात्री’ और ‘एक डरावना दिन’ कहानियों में ये डर प्रकट होता है. संदीप ‘वह सुबह के लिबास में शब थी’ कहानी में दिखाते हैं कि किस तरह शहरों की नहीं गांवों की तासीर में भी रोज तब्दीलियां हो रही हैं. कहानी का नायक अंकुर एक सुबह ऐसा वीडियो देखता है जो धरती पर इंसान को यंत्रों के माध्यम से रिप्लेस कर देता है. आप चाहकर भी इससे मुक्त नहीं हो सकते. यह यंत्र मोबाइल हो सकता है, सोशल मीडिया हो सकता है, बाजार हो सकता है. लेकिन इस दुनिया में प्रवेश करने के लिए आप अभिशप्त हैं. इस कहानी में भी खेती और किसान की चिंता से संदीप मुक्त नहीं होते. वह लिखते हैः “फिर हुआ यह कि खेती उजड़ती गई और रोजगार खत्म होते गए. बहुत से लोग तो गांव से बाहर शहरों की तरफ चले गए. जो गांव बचे थे उन्होंने भी चौक में आना बंद कर दिया.”

संदीप मील अपनी कहानियों में कई जगह फैंटेसी का भी प्रयोग करते हैं. ‘वे चंद पल जब पंख आए’, ‘जब टमाटर लाल हुआ’ ऐसी ही कहानियां हैं. ऐसा नहीं है कि संदीप शहरी दुनिया को देख और समझ नहीं रहे. बाकायदा समझ रहे हैं. ‘शहर पर ताले’ कहानी में एक युवा लड़की रौनक रात में दस बजे के बाद घर से बाहर निकलती है. शहर में हर जगह ताले लगे हुए हैं. लड़की बेखौफ घूम रही है. रास्ते में उसे पुलिसवाला और दो बाइक सवाल मिलते हैं. लेकिन वह निडर बनी रहती है. कहानी का अंतिम वाक्य है- “अंधेरी रात में बारिश में शहर के हर घर पर चमकते ताले दिखाई दे रहे हैं.”

एक युवा लड़की शहर में, रात में कितनी अकेली और असुरक्षित होती है, कहानी इसकी तरफ इशारा करती है.

संदीप मील देश में सवाल पूछे जाने और राष्ट्रवाद पर कहानियों में बात करते हैं. ‘लाश के साथ एक रात’ और ‘राष्ट्रवाद विश्वविद्यालय और टैंक’ मौजूदा समय की कहानियां हैं. ‘राष्ट्रवाद विश्वविद्यालय और टैंक’ कहानी में वह दिखाते हैं कि एक तानाशाह किस तरह शिक्षा व्यवस्था और जनता को नष्ट करने के लिए क्या-क्या कर सकता है. दूसरी तरफ ‘लाश के साथ एक रात’ कहानी दिखाती है कि किस तरह सत्ता से सवाल पूछने वाले को लाश में बदल देती है. ये ऐसी कहानियां हैं जो ग्रामीण के शहरी बनने से ज़ेहन में उपजती हैं. हालांकि संदीप मील अपनी जमीन फिर भी नहीं छोड़ते. ‘जुर्माना’ कहानी में लकड़ी काटने वाले आदिवासियों की समस्या को रेखांकित करते हैं.

संदीप मील की इन कहानियों में देसीपना, सहजता और स्वाभाविकता है. उनके पास न भाषा की और न कथ्य की कृत्रिमता है. वह नितांत मौलिक रचनाकार हैं. जिनका रचनाकर्म उनकी जमीन से जुड़ा है. उनके सरोकार हाशिये के आदमी से जुड़े हैं. आज के इस कृत्रिमता के दौर में इसलिए वह और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

किताबः बोल काश्तकार
लेखकः संदीप मील
प्रकाशकः राजपाल एण्ड सन्ज़
मूल्यः 250 रुपये

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