कौन हैं नाथ संप्रदाय की कुलदेवी, पाकिस्‍तान से क्‍या है नाता, मुस्लिम भी जिनमें रखते हैं गहरी आस्‍था

हाइलाइट्स

अमरनाथ यात्रा से भी ज्‍यादा कठिन माना जाता है नाथ संप्रदाय की कुलदेवी के मंदिर तक पहुंचना.
कुलदेवी के दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं को यात्रा से पहले 2 कठोर शपथ भी लेनी पड़ती हैं.

नाथ संप्रदाय उन योगियों का समुदाय है, जो हठयोग पर आधारित है. दीक्षा लेने के लिए इन्हें अपने कान छिदवाने होते हैं, जिसे तांत्रिक वज्रयान का सात्विक रूप कहा जाता है. नाथ संप्रदाय में अवधूत होते हैं. नाथ संप्रदाय के योगियों का दाहसंस्कार नहीं होता है. माना जाता है कि इस संप्रदाय की शुरुआत आदिनाथ शंकर से हुई है. इसे मौजूदा स्वरूप योगी गोरखनाथ ने दिया. उनको भगवान शंकर का अवतार माना जाता है. गोरक्षनाथ या गोरनाथ ने काबुल, सिंध, बलूचिस्तान और मक्का मदीना समेत कई देशों तक दीक्षा दी थी. लेकिन, क्‍या आप जानते हैं कि उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ जिस नाथ संप्रदाय से जुड़े हैं, उसकी कुल देवी कौन हैं और उनका पाकिस्‍तान से क्‍या संबंध है?

नाथ संप्रदाय हिंगलाज माता को अपनी कुलदेवी मानता है. कथाओं के अनुसार, सती के वियोग में दुखी भगवान शिव जब उनकी पार्थिव देह लेकर तीनों लोकों में घूमने लगे तो भगवान विष्णु ने सती के शरीर को 51 टुकड़ों में बांट दिया. इससे जहां-जहां सती के अंग गिरे, उन स्थानों को शक्तिपीठ कहा गया. केश गिरने से महाकाली, नैन या आंखें गिरने से नैना देवी, कुरूक्षेत्र में गुल्फ गिरने से भद्रकाली, सहारनपुर के पास शिवालिक पर्वत पर शीश गिरने से शाकम्भरी शक्तिपीठ बने. माता सती के शव को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से काटे जाने पर हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर मौजूद किर्थर पर्वत एक गुफा में उनके सिर का ब्रह्मरंध्र वाला हिस्‍सा गिरा था. यहां उन्‍हें हिंगलाज माता के नाम से पूजा जाता है.

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हिंगलाज माता मंदिर में आदिशक्ति पिंडी रूप में विराजमान हैं.

पाकिस्‍तान के बलूचिस्‍तान में है ‘हिंगलाज माता मंदिर’
नाथ संप्रदाय की कुलदेवी हिंगलाज माता का गुफा मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान में लारी तहसील के पहाड़ी इलाके में है. यह कराची से उत्तर-पश्चिम में 250 किलोमीटर दूर मौजूद है. यह हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर मकरान रेगिस्तान के खेरथार पहाड़ियों की एक शृंखला के आखिर में है. यह क्षेत्र हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के अन्तर्गत आता है. हिंगलाज माता मंदिर छोटी प्राकृतिक गुफा में है. यहां देवी की मानव निर्मित कोई प्रतिमा नहीं है. यहां एक मिट्टी की वेदी बनी हुई है, जिसकी हिंगलाज माता के रूप में पूजा की जाती है. हिंगलाज माता मंदिर के आसपास गणेशजी, माता काली, गुरु गोरखनाथ, ब्रह्म कुंड, त्रिकुंड, गुरुनानक खाराओ, रामझरोखा बैठक, अनिल कुंड, चंद्र गोप, खारिवर और अघोर पूजा जैसे कई पूजास्थल हैं.

अमरनाथ यात्रा से भी कठिन है हिंगलाज पहुंचना
अमरनाथ यात्रा को बहुत कठिन माना जाता है, लेकिन हिंगलाज माता मंदिर पहुंचना इससे भी ज्यादा मुश्किल बताया जाता है. दरअसल, हिंगलाज माता मंदिर के रास्ते में 1000 फुट ऊंचे पहाड़, विशाल सुनसान रेगिस्तान, जंगली जानवर, घने जंगल और 300 फीट ऊंचा मड ज्वालामुखी भी पड़ता है. इन प्राकृतिक दिक्‍कतों के साथ ही इस इलाके में डाकुओं और आतंकियों का डर भी लगातार बना रहता है. यहां जाने के लिए 30 से 40 श्रद्धालुओं का समूह बनाया जाता है. किसी भी व्‍यक्ति को अकेले ये यात्रा करने की मंजूरी नहीं दी जाती है. श्रद्धालुओं को 55 किमी की पैदल यात्रा 4 पड़ावों में पूरी करनी होती है. पहले हिंगलाज मंदिर पहुंचने के लिए 200 किमी की पदयात्रा करनी होती है, जिसमें 3 महीने तक लग जाते थे.

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हिंगलाज माता मंदिर किर्थर पर्वत की एक गुफा में स्थित है.

श्रद्धालुओं को लेनी पड़ती हैं 2 खास शपथ
हिंगलाज माता के दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं को यात्रा शुरू करने से पहले 2 खास शपथ लेनी पड़ती हैं. इनमें पहली शपथ होता है, हिंगलाज माता के दर्शन करके वापस लौटने तक सन्यास ग्रहण करने की. दूसरी है, यात्रा के दौरान अपने सहयात्री को अपनी सुराही का पानी नहीं देने की. माना जाता है कि भगवान राम के समय से ही ये दोनों शपथ हिंगलाज माता मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों की परीक्षा के तौर पर चली आ रही हैं. इन दोनों शपथ को पूरा नहीं करने वाले श्रद्धालुओं की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती है.

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हिंगलाज माता मंदिर तक कैसे पहुंचा जा सकता है?
हिंगलाज माता मंदिर की यात्रा में श्रद्धालुओं को 5 अहम पड़ाव पार करने होते हैं. इसमें पहला चंद्रकूप पड़ता है, जिसे मड ज्‍वालामुखी भी कहा जाता है. यहां श्रद्धालु 300 फुट ऊंचे शिखर पर नारियल और अगरबत्‍ती चढ़ाते हैं. इसके बाद चंद्रकूप के दर्शन करते हैं. इसके बाद दूसरा पड़ाव अघोर नदी होता है. इस नदी में स्‍नान करने के बाद ही यात्री आगे बढ़ते हैं. इसके बाद यात्रियों का समूह चौरासी धाम पहुंचते हैं, जो चौरासी कुंड भी कहा जाता है. मान्‍यता है कि इसे गुरु गोरखनाथ के शिष्‍यों ने बनवाया था. इसे यात्रा का सबसे मुयिकल पड़ाव माना जाता है.

हिंगलाज माता मंदिर यात्रा में चौथा पड़ाव आता है अलैल कुंड, जिसका पानी पीकर यात्री आगे बढ़ते हैं. काफी श्रद्धालु इस कुंड का पानी अपने साथ भी ले जाते हैं. हिंगलाज माता मंदिर के सामने बना कुंड यात्रा का आखिरी पड़ाव है. मान्‍यता है कि इस कुंड में स्‍नान करने से श्रद्धालुओं के पाप भी धुल जाते हैं. यहां लोगों को अपने पुराने कपड़े छोड़कर नए पीले कपड़े पहनने होते हैं. इसके बाद श्रद्धालु माता हिंगलाज के दर्शन के लिए गुफा में जाते हैं.

स्‍थानीय मुस्लिम समुदाय की भी है अगाध आस्‍था
हिंगलाज माता पर दुनियाभर के हिंदुओं के साथ ही स्थानीय मुस्लिम समुदाय की भी अगाध आस्था है. इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोग भी हिंगलाज माता मंदिर की सुरक्षा करते हैं. मुस्लिम समाज के लोग हिंगलाज माता मंदिर को ‘नानी का मंदिर’ कहते है. देवी को बीबी नानी या सम्मानित मातृ दादी कहा जाता है. बीबी नानी नाना के समान हो सकती है, जो कुशाण काल के सिक्कों पर पाए जाने वाले एक पूज्य देव थे. उनकी पश्चिम और मध्य एशिया में पूजा की जाती थी. प्राचीन परंपरा का पालन करते हुए स्थानीय मुस्लिम जनजातियां तीर्थयात्रा समूह में शामिल होती हैं और तीर्थयात्रा को ‘नानी की हज’ कहते हैं.

Tags: Balochistan, CM Yogi Adityanath, Dharma Aastha, Dharma Guru, Gorakhnath Temple, Pakistan, Religious Places

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