दास्तान-गो: ‘श्रद्धा, भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा’, ऐसा संदेश देने वाले पंडित श्रद्धाराम शर्मा थे

दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…

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जनाब, वह चाहे हिन्दुस्तान के भीतर हो या बाहर किसी मुल्क में रहने वाला. अगर हिन्दुस्तानी है, सनातनी है तो साल में दो-चार मर्तबा पूजा-पाठ के समय ये आरती ज़रूर गाता होगा, ‘ओम जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे, भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करें’. लेकिन, बहुतों के लिए ये जानना मुश्किल है कि यह आरती लिखी किसने है. वैसे, किसी को इस बात से ज़्यादा मतलब भी न हो शायद. फिर भी, यह बताना लाज़िम है कि इस आरती में ही उसे लिखने वाले का नाम भी है, एक जगह. ठीक वैसे ही, जैसे हिन्दी या उर्दू की कविताओं, शा’इरी में अक्सर होता है. इस आरती की आख़िरी लाइनों कुछ इस तरह हैं, ‘विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा, श्रद्धा, भक्ति बढ़ाओ संतन की सेवा’. इन लाइनों में यह जो ‘श्रद्धा’ लफ़्ज़ है न, इसका मतलब श्रद्धा-भाव से तो है ही, पंडित श्रद्धाराम शर्मा से भी है. क्योंकि वह पंडित श्रद्धाराम ही थे, जिन्होंने ये आरती लिखी.

और जनाब ये श्रद्धाराम जी कोई आम शख़्सियत नहीं थे. इन्होंने रस्मी तौर पर कोई ता’लीम नहीं ली. स्कूल, कॉलेज़ की कोई डिग्री नहीं थी इनके पास. फिर भी पढ़े-लिखे इतने हुए कि इन्हें ‘पंजाबी भाषा का पितृ पुरुष’ कहा जाने लगा. इतना ही नहीं ‘आधुनिक पंजाबी भाषा’ का जनक भी. यानी आज जो गुरुमुखी के नाम से पंजाबी ज़बान अधिकांश बोलने, लिखने-पढ़ने में इस्तेमाल की जाती है, उसका सिलसिला पंडित श्रद्धाराम से शुरू होता है. ये पंजाब के फिल्लौर क़स्बे (जालंधर जिला) में पैदा हुए थे, इसीलिए पंजाबी ज़बान इनके दिल के क़रीब रही. लेकिन सिर्फ़ वही नहीं, संस्कृत और फारसी ज़बानों के भी अच्छे जानकार हुए श्रद्धाराम जी. ज़्योतिष और संगीत के सिद्धहस्त और हिन्दी ज़बान में तो पहला उपन्यास लिखने का श्रेय भी इन्हीं के नाम पर दर्ज़ हुआ. श्रद्धाराम जी ने ‘भाग्यवती’ के नाम से वह उपन्यास लिखा था. साल 1877 की बात है यह.

पंजाब के हिंदी अदब को पूरे मुल्क में पहचान दिलाने के लिए अहम किरदार अदा करने वाले एक साहब हैं डॉक्टर हरमहेंद्र सिंह बेदी. वे 35 साल तक गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे हैं. उन्होंने ‘पंडित श्रद्धाराम शर्मा फिल्लौरी ग्रंथावली’ भी लिखी है. यह तीन हिस्सों में है. यानी उन्होंने श्रद्धाराम जी के बारे में अच्छी-ख़ासी रिसर्च की हुई है. उन्होंने ही बीते सालों में एक नहीं कई मर्तबा इस बात का ख़ुलासा किया है, ‘कुछ समय पहले तक लाला श्रीनिवास द्वारा लिखे ‘परीक्षा गुरु’ को हिन्दी का पहला उपन्यास समझा जाता था. लेकिन अस्लियत यह है कि उससे भी काफ़ी पहले श्रद्धाराम जी ने ‘भाग्यवती’ लिख दिया था’. अलबत्ता ये मुमकिन है जनाब, इन दोनों उपन्यासों के छपने के सालों में कोई आगा-पीछा हुआ हो. इससे ग़फ़लत बनी हो कि पहले श्रीनिवास जी का उपन्यास आया या श्रद्धाराम जी का. हालांकि इससे बहुत फ़र्क पड़ना नहीं चाहिए.

Pt Shraddha Ram Sharma

डॉक्टर बेदी की मानें तो, ‘श्रद्धाराम जी का उपन्यास ‘भाग्यवती’ पहली बार 1888 में प्रकाशित हुआ. जबकि श्रीनिवास जी का ‘परीक्षा गुरु’ साल 1902 में’. लेकिन कई जगहों पर ‘परीक्षा गुरु’ के पहले प्रकाशन का साल 1882 भी बताया जाता है. यानी लगभग उन्हीं सालों के आस-पास जब इसे लिखा गया होगा. हालांकि इस सबके बावजूद हिन्द़ी, पंजाबी अदब की दुनिया में ‘भाग्यवती’ का दर्ज़ा बहुत ऊंचा है. क्योंकि यह कोई आम अफ़साना नहीं कहता. बल्कि काशी के एक बरहमन खानदान की बेटी की कहानी कहता है, जिसकी शादी बचपने में ही हो गई है. यानी बाल-विवाह हो गया है. फिर वह उसी कम-उम्र में विधवा हो जाती है. लेकिन उसे सती नहीं किया जाता. पति की चिता पर जलाया नहीं जाता. बल्कि उसकी दोबारा शादी (विधवा-विवाह) होती है. और दूसरे घर में पहुंचकर वह अपने सौभाग्य की ए’लान करती है, ‘मैं भाग्यवती हूं, इस घर के भाग जगाने आई हूं’.

सोचकर देखिए जनाब, जिस दौर में बाल-विवाह और सती-प्रथा जैसी कु-प्रथाएं आम थीं और विधवा-विवाह के बारे में सोचना भी मुश्किल, उस वक़्त श्रद्धाराम जी ने ये कारनामा किया. ज़ाहिर तौर पर समाज में इसका बड़ा असर दिखा. वह भी दो-तरफ़ा. इसमें एक तरफ़ तो समाजी-ठेकेदारों का वह हिस्सा उनका विरोधी हो गया, जिसने इस क़िस्म के साहित्य में उनकी लिखी बातों को ग़लत माना. लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ समाज का एक बड़ा वर्ग उनके साथ, समर्थन में भी आया. बताया तो यहां तक जाता है कि एक वक़्त पर श्रद्धाराम जी का ये ‘भाग्यवती’ उपन्यास अमृतसर और लाहौर की दाज-वरी की दुकानों पर मुफ्त दिया जाने लगा था. इसे बेटी के दहेज का एक ज़रूरी हिस्सा मान लिया गया था. यानी इस उपन्यास के ज़रिए श्रद्धाराम ने एक साथ दो कु-प्रथाओं (बाल-विवाह और सती प्रथा) पर चोट की. साथ ही साथ विधवा-विवाह को प्रोत्साहित किया.

यही नहीं, श्रद्धाराम जी ने ऐसे और भी कई काम किए जो उनके वक़्त से बहुत आगे थे. जैसे-औरतों को पूजा-पाठ में बराबरी का हक़ देना. मंदिर में बतौर पुजारी, उन्हें अहमियत देने का काम. यानी वे बातें, जो आज के दौर में अमूमन सुनी जाती हैं. बताते हैं, श्रद्धाराम जी ने फिल्लौर में ही एक मंदिर बनवाया था. उसमें पूजा-पाठ, देख-रेख समेत पूरा दार-ओ-मदार औरतों को सौंप दिया. वह मंदिर आज भी क़स्बे के बीचों-बीच है. अब भी उसका दार-मदार औरतों पर ही हैं. कहते हैं, श्रद्धाराम जी सिर्फ़ लिखते ही नहीं बोलते भी अच्छा थे. इससे बहुत से नौजवान उनकी बातों के असर में आ जाया करते थे. इस सबसे ज़ाहिर है, तमाम लोगों के पेट में तक़लीफ़ तो हुई ही होगी. सो, उन्होंने अंग्रेज सरकार को भड़काकर साल 1865 में कुछ वक़्त के लिए श्रद्धाराम जी पर प्रतिबंध लगवा दिया. अब फिल्लौर और उसके आस-पास के कई गांवों में उनके घुसने पर पाबंदी लगा दी गई.

अलबत्ता, श्रद्धाराम जी के मुरीद अंग्रेजों के बीच भी पाए गए. उन्हीं में एक हुए फादर न्यूटन. पादरी होते थे. उन्होंने सरकार पर अपने असर को ज़रिया बनाकर श्रद्धाराम जी पर लगी पाबंदी कुछ ही दिनों में हटवा दिया. सिर्फ़ यही नहीं, श्रद्धाराम जी से उन्होंने ‘बाइबिल’ के कुछ हिस्सों का गुरुमुखी में अनुवाद भी कराया. यह वाक़ि’आ है 1868 के आस-पास का. इस सबके साथ यह भी बताना अहम है कि श्रद्धाराम जी ने शिक्षा-दीक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी काफ़ी काम किया, ख़ास तौर पर औरतों के लिए. इस सिलसिले में उनकी एक और किताब यहां काबिल-ए-ज़िक्र है, ‘सिखां दे राज दी विथिया’ (सिखों की हुक़ूमत का क़िस्सा). इसमें पंजाब की तहज़ीब, वहां की रवायतें, वहां का हुनर, वहां की ज़बान और ऐसी तमाम चीजों को तफ़्सील से बताया गया है. सो, जाहिर तौर पर इस किताब को स्कूल, कॉलेजों में पढ़ने लायक समझा गया. उसे वह दर्ज़ा भी मिला.

Pt Shraddha Ram Sharma

और जनाब, इतना कुछ करने के लिए श्रद्धाराम जी को सदियां नहीं लगीं. बस 30-35 बरस ही लगे उनकी ज़िंदगी के क्योंकि 43 साल तो उनकी कुल उम्र ही रही. साल 1881 में जून महीने की 24 तारीख़ को उन्होंने इस दुनिया से रुख़्सती ले ली. जबकि साल 1837 में सितंबर की 30 तारीख़ को उनकी पैदाइश हुई, यानी आज के ही रोज़. इनके वालिद जयदयालु जी भी बड़े नामी ज्योतिषी होते थे. कहते हैं, उन्होंने श्रद्धाराम जी के जन्म के वक़्त ही बता दिया था कि इस ‘बच्चे की ज़िंदगी लंबी नहीं, बड़ी होगी’. और देखिए हुई ही आख़िर, श्रद्धाराम जी की ज़िंदगी बहुत बड़ी. इस ज़िंदगी में वे लोगों को दो सबसे अहम बातें सिखाकर गए. पहली ख़ास तौर पर, औरतों के लिए ‘श्रद्धा’ और दूसरी ऊपर वाले के लिए ‘भक्ति’. और छिपे मतलबों में यह भी बताते गए जब इस क़िस्म की श्रद्धा और भक्ति दोनों होगी, तभी भगवान जगदीश ‘भक्त जनों के संकट दूर करेंगे’.

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