रिश्वत लेकर वोट मामले में सांसदों, विधायकों को मुकदमे से छूट के फैसले पर पुनर्विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट, जानें मामला

इनपुट- भाषा 

नई दिल्ली. झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से जुड़े घूसकांड के लगभग तीन दशक बाद उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह 15 नवंबर को इस सवाल पर पुनर्विचार करेगा कि क्या कोई सांसद या विधायक संसद या विधानसभा में भाषण या वोट देने के बदले रिश्वत लेने के मामले में आपराधिक अभियोजन से छूट की मांग कर सकता है.

न्यायमूर्ति एसए नजीर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि मामले पर विचार किए जाने की जरूरत है. पीठ ने कहा कि हम मामले पर 15 नवंबर 2022 को विचार करेंगे. इस पीठ में न्यायमूर्ति बी आर गवाई, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना, न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यन और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्न भी शामिल हैं. 2019 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति ए एस नजीर और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने ‘व्यापक प्रभाव’ और ‘पर्याप्त सार्वजनिक महत्व’ वाले इस महत्वपूर्ण प्रश्न को पांच न्यायाधीशों की पीठ को सौंप दिया था.

24 साल पुराने फैसले पर पुनर्विचार करेगा कोर्ट 

न्यायमूर्ति गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने तब कहा था कि वह झामुमो से जुड़े सनसनीखेज घूसखोरी कांड में शीर्ष अदालत के 24 साल पुराने फैसले पर पुनर्विचार करेगी. पीठ ने झारखंड की जामा विधानसभा सीट से झामुमो विधायक सीता सोरेन द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की थी. सीता सोरेन ने झारखंड उच्च न्यायालय के 17 फरवरी 2014 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत 2012 में हुए राज्यसभा चुनाव में एक विशेष उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने के लिए कथित रूप से रिश्वत लेने के आरोप में उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को खारिज करने से इनकार कर दिया गया था.

जानें पूरी बात 

बता दें, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने सीता सोरेन पर कथित तौर पर एक प्रत्याशी से रिश्वत लेने और दूसरे के पक्ष में मतदान करने का आरोप तय किया था. सीता सोरेन झामुमो प्रमुख और पूर्व केंद्रीय मंत्री शिबू सोरेन की बहू हैं, जो कथित तौर पर इस घूसखोरी कांड में शामिल थे. मालूम हो कि 1993 में विश्वास मत पर मतदान के दौरान पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए झामुमो के चार विधायकों और आठ सांसदों को कथित रूप से रिश्वत दी गई थी. सांसदों और विधायकों ने सरकार के पक्ष में मतदान किया था और जब घोटाला सामने आया तो उन्होंने इस आधार पर आपराधिक अभियोजन से छूट देने की मांग की थी कि मतदान संसद के भीतर हुआ था.

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने सांसदों को सदन में दिए गए भाषण और वहां डाले गए वोट के लिए कानूनी कार्यवाही से मिली छूट को बरकरार रखा था. फैसले के लगभग तीन दशक बाद शीर्ष अदालत सीता सोरेन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान इस पर पुनर्विचार करेगी.

Tags: Delhi news, Jharkhand High Court, Jharkhand news

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