07 दिसंबर 1856 : जब देश में पहली बार हुआ आज के ही दिन विधवा पुनर्विवाह

हाइलाइट्स

विद्यासागर की कोशिश के कारण ही 26 जुलाई 1856 को हिंदू विधवा पुर्नविवाह कानून 1856 बना
इस शादी से कोलकाता में तब खासी नाराजगी भी थी और बलवा होने की आशंका थी
लेकिन इस शादी से इतनी नाराजगी फैली कि नवदंपत्ति को लखनऊ में जाकर रहना पड़ा

07 दिसंबर 1856 के दिन कोलकाता एक अजीब सा तनाव था. थोड़े दिनों पहले ही विवाह पुनर्विवाह कानून बन गया था. अब कलकत्ता में इस कानून के आधार पर पहली शादी होने वाली थी. विधवा थी 10 साल की मासूम सी कालीमती और वर थे श्रीचंद्र विद्यारत्न. पुलिस का कड़ा प्रहरा था. चहल-पहल थी और कुछ लोग पूरी तैयारी के साथ एक मकान के सामने मुस्तैद थे ताकि किसी भी तरह की कोई गड़बड़ी नहीं हो पाए.

उस दिन ऐसा लग रहा था कि कलकत्ता की सारी सड़कें उसी खास मकान 12, सुकीस स्ट्रीट की ओर जा रही हैं. ये शादी राज कृष्ण बंदोपाध्याय के घर पर हो रही थी, जो प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रोफेसर थे.

भीड़ में उत्तेजना थी और नाराजगी
सड़क पर इकट्ठा होती भीड़ उत्तेजित थी, कुछ चकित थे और कुछ नाराज. जब पालकी वर और वधू को लाया गया तो वाकई स्थिति को संभालना मुश्किल हो गया. ऐसा लगा कि कहीं बलवा ही ना हो जाए. लेकिन पुलिस के साथ कुछ लोगों ने स्थिति को काबू में कर लिया.

पुलिस का भारी बंदोबस्त था
सुकीस स्ट्रीट में गिने चुने लोग ही दाखिल हो पाएं, इसका भी पूरा इंतजाम किया गया था. जिस रास्ते से पालकी को लाया गया. उस पूरे रास्ते पुलिस का भारी बंदोबस्त किया गया था. साथ ही ईश्वरचंद्र विद्यासागर की अगुवाई में कलकत्ता के कुछ प्रभावशाली लोग भी इस व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए वहां मौजूद थे, इनमें से ज्यादातर ब्राह्मण ही थे, जो अपने समाज को कुरीतियों और बेड़ियों से दूर करने के लिए बीड़ा उठा चुके थे.

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ये है कोलकाता का वो घर, जहां पहली बार विधवा का पुनर्विवाह आयोजित कराया गया.

ईश्वर चंद्र विद्यासागर की कोशिश से ऐसा हो पाया
ईश्वर चंद्र विद्यासागर की कोशिश के कारण ही 26 जुलाई 1856 को हिंदू विधवा पुर्नविवाह कानून 1856 बन सका. इसके बाद हिंदू विधवाओं की फिर से शादी को कानूनी जामा पहना दिया गया. ये कानून का मसौदा खुद लार्ड डलहौजी ने तैयार किया था तो इसे पास किया लार्ड कैनिंग ने. हालांकि इसके मार्ग में बहुत सी बाधाएं आईं. इससे पहले जो बड़ा समाज सुधार कानून पास हुआ था, वो था सतीप्रथा का बंदीकरण.

10 साल की कालीमती कुछ समय पहले ही विधवा हुई थी
10 साल की कालीमती कुछ समय पहले विधवा हुई थी. उसके साथ शादी करने वाले युवक श्रीचंद्र विद्यारत्न एक संस्कृत कॉलेज में टीचर थे और विद्यासागर के सहयोगी.
इस घटना को शिवनाथ शास्त्री ने लिखा, जो उस समय बच्चे थे लेकिन बाद में वो ब्रह्मसमाज के जाने माने नेता बने. उन्होंने इसे अखबारों में लिखा. हालांकि इस कानून के बनने के दो दशक पहले ही दक्षिणारंजन मुखोपाध्याय बर्दवान की रानी और राजा तेजचंद्र की विधवा वसंता कुमारी से शादी रचा चुके थे लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया था, क्योंकि तब तक ऐसा कानून नहीं बना था. ये शादी इसलिए भी खास थी कि मुखोपाध्याय ब्राह्मण थे और उन्होंने अपनी जाति से परे जाकर भी शादी की थी.
तब इस शादी के गवाह कलकत्ता पुलिस मजिस्ट्रेट खुद बने थे. लेकिन इससे कलकत्ता और बंगाल में इतनी नाराजगी फैली कि नवदंपति को वहां से बाहर जाना पड़ा और लखनऊ में जाकर शरण लेनी पड़ी.

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ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने ठान लिया था कि वो विधवाओं के फिर से विवाह के लिए कानून बनवाकर ही रहेंगे और आखिरकार ऐसा हुआ भी.

तब बहुत कम उम्र में बंगाल में लड़कियों की शादी हो जाती थी
इससे पहले जब भी किसी अभिभावक ने अपनी छोटी विधवा बेटियों की फिर से शादी करने की कोशिश की. उन्हें इसका तगड़ा विरोध झेलना पड़ा. उस समय बंगाल में लड़कियों की शादी बहुत कम उम्र में 08-10 के बीच हो जाती थी. कई बार लड़कियों की शादी 60-70 साल के पुरुषों से होती थी. जो ज्यादा जी नहीं पाते थे. उनकी मृत्यु के बाद कम उम्र की इन विधवा लड़कियों की हालत बहुत दयनीय हो जाती थी. समाज आमतौर पर उनसे अमानवीय व्यवहार करता था.

पाराशर संहिता में उन्होंने विधवा पुनर्विवाह को खोज निकाला
ऐसे में विद्यासागर ने बीड़ा उठा लिया कि वो विधवाओं के पुनर्विवाह को कानूनी जामा पहनाकर रहेंगे. उन्होंने इसके लिए शास्त्रों का वृहद अध्ययन किया कि क्या प्राचीन काल में ऐसा हुआ है या हिंदू शास्त्रों में ऐसा कोई उल्लेख आय़ा है. उन्होंने संस्कृत कॉलेज में इन ग्रंथों को पढ़ने और मनवांछित बात तलाशने के लिए काफी समय लगाया. आखिरकार वो उन्हें मिल गया.
पाराशर संहिता में उन्हें वो मिला, जो वो तलाश रहे थे. यानि विधवाओं का विवाह शास्त्र सम्मत था. हालांकि इसका हिंदू समाज से भारी विरोध हुआ. लेकिन आखिरकार बिल पास हो ही गया. लेकिन कानून बन जाने के बाद भी विद्यासागर का काम खत्म नहीं हुआ था. उनका मानना था कि जब तक कि इस तरह की शादी शुरू नहीं हो जाती, तब तक ऐसे कानून बना लेने का कोई मतलब नहीं है.

वर शादी से पहले डर के मारे पैर पीछे खींचने लगा
वर पंडित श्रीचंद्र विद्यारत्न उनके मित्र के युवा बेटे थे. 24 परगना में रहते थे. जबकि वधू कलामती देवी एक बालिका विधवा थी, जो बर्दवान के पालासदंगा गांव की रहने वाली थी. शादी की तारीख पहले 27 नवंबर 1856 तय की गई लेकिन श्रीचंद्र सामाजिक भय के चलते पैर पीछे खींचने लगे थे. इस मामले में श्रीचंद्र की मां लक्ष्मीमणि देवी दृढ थीं कि उन्हें बेटे की शादी विधवा बालिका से ही करनी है. वो खुद विधवा थीं.

फिर दोस्तों और विद्यासागर ने दूर किया डर
वर श्रीचंद्र के डर को काफी हद तक उनके दोस्तों ने भी दूर किया. खासकर विद्यासागर ने उन्हें बहुत संबल दिया. जब ये बात कलकत्ता और बंगाल में पता लगनी शुरू हुई तो इसका तीखा विरोध शुरू हो गया. तब राज कृष्ण बंदोपाध्याय सामने आए, जिन्होंने शादी का पूरा इंतजाम अपने घर में करने की घोषणा की. विद्यासागर ने वधू को खुद अपने हाथ से बुनी साड़ी और गहने उपहार में दिए और शादी के अन्य खर्चों का वहन भी खुद ही किया.
बाद में विद्यासागर ने कई और ऐसी शादियों में खुद खर्च का वहन किया. इसके चलते उन पर काफी कर्ज भी हो गया. पहली विधवा शादी होने के बाद बंगाल में हूगली और मिदिनापुर में ऐसी ही शादियां हुईं. हालांकि ये बहुत मुश्किल होता था. लेकिन धीरे धीरे इसने जोर पकड़ लिया.

Tags: Bengal, Court Marriage, Kolkata, Marriage, Marriage Law

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