AIIMS Study on Children: कोरोना महामारी से बच्चों में बढ़ रहा मानसिक तनाव, एक्सपर्ट दे रहे हैं सरकार को ये सुझाव

नई दिल्ली: क्या देश का भविष्य खतरे में है. ये सवाल इसलिए क्योंकि कोरोना काल में बच्चे (Children) अब मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं. 

एम्स की स्टडी के मुताबिक देश के 75% से ज्यादा बच्चों पर कोरोना का नेगेटिव असर पड रहा है. इसलिए तीसरी लहर की चिंता से पहले, उनके आज को संवारने पर ध्यान दे, ताकि उनका और देश का कल बेहतर हो सके. 

डेढ़ साल से घरों में बंद हैं बच्चे

पिछले करीब डेढ़ साल से बच्चे ऑनलाइन क्लासेज कर अपनी पढ़ाई कर रहे हैं या घरों में मोबाइल पर खेलकर गुजारा कर रहे हैं. बच्चों का ज्ञान कितना ज्ञान बढ़ा. ये तो शायद ही कोई बता पाए लेकिन, इस दौरान बच्चों (Children) में काफी कुछ बदल गया है. देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान AIIMS की स्टडी (AIIMS Study on Children) यही बता रही है. बच्चों पर किए गए शोध के मुताबिक उनमें साइकोलॉजिकल बीमारी तेज़ी से बढ़ रही है.

 एम्स के डॉक्टरों ने तकरीबन 15 स्टडी (AIIMS Study on Children) का एक मेटा एनालिसिस किया है. इसमें तकरीबन 22 हजार 996 बच्चों पर शोध किया गया है. एम्स के शोध के मुताबिक 34.5% बच्चों में घबराहट की बीमारी बढ़ गई है. वहीं 41.7 फीसदी बच्चों में डिप्रेशन की शिकायत बढ़ी है.  इसके अलावा 42.3 फीसदी बच्चों में चिड़चिड़ापन की बीमारी बढ़ गई है. स्टडी किए गए बच्चों में 30.8 फीसदी बच्चों में आनाकानी करने की समस्या देखी गई है. 

करीब 79% बच्चे मानसिक तनाव में

कुल मिलाकर 79% बच्चे कोरोना से मानसिक तौर पर प्रभावित हुए हैं. वहीं 22% ऐसे हैं, जो कोरोनावायरस से डरे हुए है. इन बच्चों में नींद कम आना,  बोर ज्यादा होना जैसे लक्षण भी बड़े पैमाने पर देखे गए हैं. जानकार मानते हैं कि इसका एकमात्र कारण बच्चों का घर के अंदर बंद होना है. 

एम्स (AIIMS) में बाल न्यूरोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. शेफाली गुलाटी कहती हैं कि कोरोना की दूसरी लहर में जिस तरीक़े से बच्चे (Children) अनाथ हुए हैं. उससे बच्चों पर काफ़ी ज़्यादा मानसिक प्रभाव पड़ा है. वे कहती हैं कि कोरोना के केस कम होने पर बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास को ध्यान में रखकर ही स्कूल खोलने पर विचार करना चाहिए. 

एम्स (AIIMS) की कोविड टास्क फोर्स के सदस्य डॉ. संजय राय कहते हैं कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय स्थिति को देखते हुए राज्य सरकारों को स्कूल खोलने का फैसला करने का अधिकार दे चुका है. वे कहते हैं कि दुनियाभर के कई देशों में स्कूल खोले जा चुके है. स्कूल न खुलने से बच्चों के विकास पर असर पड़ता है. 

‘हालात देखते हुए स्कूल खोले जाएं’

एक्सपर्ट कहते हैं कि स्कूल बंद करके हम बच्चों को ज्यादा नुकसान पहुचा रहे हैं. इससे बच्चों के ओवरऑल विकास पर असर पड़ता है.उनकी मानसिक स्थिति भी प्रभावित होती है. दुनिया के ज्यादातर देशों में स्कूल खोल दिए गए हैं. यूके में हमसे ज्यादा इंफेक्शन रेट था. जैसे ही वहां पर स्थिति काबू में आई, वहां पर स्कूल खोल दिए गए हैं. 

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीष मनन कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि स्कूल जल्द खोले जाएंगे. दूसरी लहर में बच्चे काफी संक्रमित हुए हैं लेकिन गम्भीर नही हुए हैं. एक महीने में इन केस में कमी आ जाएगी. ऐसे में कोविड प्रोटोकॉल के साथ स्कूल खोले जा सकते हैं.’ 

तीसरी लहर का बच्चों पर कितना प्रभाव?

Indian Academy of Pediatrics यानी आईएपी ने कहा है कि अब तक बच्चों में लगभग 90 प्रतिशत संक्रमण हल्के या एसिम्प्टमैटिक रहे हैं. भारतीय बाल रोग अकादमी ने कहा कि इस बात के सबूत नहीं मिल रहे है कि कोरोना की तीसरी लहर में बच्चों (Children) के लिए कितना खतरा रहेगा.  एम्स के डायरेक्टर और कोरोना पर बनी इंपॉवर्ड ग्रुप के सदस्य डॉ रणदीप गुलेरिया ने तीसरी लहर में बच्चों के लिए ज्यादा खतरे वाली बात से इनकार किया है.. 

कोरोना महामारी की वजह से बच्चे पिछले डेढ़ साल से घरों में बंद हैं. ऐसे में बच्चों के मन में निराशा घर कर जाना कोई असामान्य बात नहीं है. वहीं ऑनलाइन पढ़ाई से उन्हें कई दूसरी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. उनकी पढाई भी प्रभावित हो रही है. आंखों और नींद संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं.

‘बच्चों को बिजी रखने का शेडयूल बनाएं’

मनोवैज्ञानिक डॉ भावना बर्मी का कहना है कि पैरंट्स अपने बच्चों (Children) का शेड्यूल बनाएं. उन्हें अपने घर की दूसरी गतिविधियों में शामिल करें, जैसे वे खाना बनाने में मदद कर सकते हैं. भाई बहनों के साथ खेलना, पूरे परिवार को एक साथ हंसी खुशी का समय बिताना लंबे समय में बहुत अच्छे नतीजे देने वाला हो सकता है.

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