DNA ANALYSIS: चीन का काउंटडाउन शुरू, 88 दिनों में दुनिया के सामने होगी Corona की सच्चाई!

नई दिल्ली: पहली बार 31 दिसंबर 2019 को चीन (China) में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दफ्तर ने जिनेवा (Geneva) में अपने मुख्यालय को ये सूचना भेजी थी कि वुहान में कुछ लोग निमोनिया से मिलती जुलती बीमारी से संक्रमित हुए हैं. निमोनिया (Pneumonia) फेफड़ों में होने वाले संक्रमण की बीमारी को कहते हैं. ये वही दिन था, जब पूरी दुनिया नए वर्ष में प्रवेश करने की तैयारी कर रही थी. दुनिया के लगभग सभी बड़े शहरों में वर्ष 2020 का शानदार स्वागत हुआ. लेकिन जिस समय दुनिया जश्न में डूबी थी, तब ये चिट्ठी WHO के दफ्तर में एक बम की तरह गिरी.

जनवरी 2020 तक मिल चुके थे 44 केस

WHO ने 1 जनवरी 2020 को चीन से इस पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा और चीन ने इस पर 3 जनवरी 2020 को अपना जवाब दिया. उस समय चीन ने पहली बार दुनिया को ये बताया था कि वुहान में निमोनिया से मिलती जुलती बीमारी फैल रही है. चीन के मुताबिक, तब तक वुहान में 44 लोग ही इस अज्ञात बीमारी से संक्रमित थे, जिनमें से 11 की हालत बहुत गंभीर थी. ऐसा चीन दावा करता है. तब चीन ने विस्तार से इस पर जानकारी उपलब्ध कराते हुए WHO से कहा था कि इस बात के सबूत नहीं मिले हैं कि ये बीमारी एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलती है. तब सिर्फ WHO ने ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया ने चीन पर विश्वास किया, लेकिन ये विश्वास अगले कुछ दिनों में ही टूट गया. क्योंकि चीन ने उस समय पूरी दुनिया से झूठ बोला था. हालांकि इस बात को आज 1 साल 4 महीने 28 दिन बीत चुके हैं. ये समय कम नहीं होता.

514 दिन बीते, फिर भी नहीं मिला कोई ठोस सबूत

आप इसे ऐसे समझिए कि घड़ी की सुईं 514 दिन, 12 हजार 336 घंटे, 7 लाख 40 हजार 160 मिनट और 4 करोड़ 44 लाख 9 हजार 600 सेकेंड पूरे कर चुकी है. लेकिन इतना समय बीतने के बाद भी दुनिया कोरोना वायरस को लेकर खाली हाथ है. आज तक ये स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कोरोना वायरस (Coronavirus) की उत्पत्ति कैसे हुई? ये वायरस वुहान की लैब से फैला या ये बीमारी जानवरों से इंसानों में फैली? आज तक ये स्पष्ट नहीं हो पाया है. लेकिन अब पूरी दुनिया इसे लेकर गंभीर हो गई है और आज हम आपको इसी के बारे में बताएंगे. आज हम कोरोना वायरस की इस लैब लीक थ्योरी को सरल भाषा में आपके लिए डिकोड करेंगे.

90 दिन में कोरोना की उत्पत्ति का पता लगाएगा US

इसकी शुरुआत हम अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन (Joe Biden) के एक आदेश से करना चाहते हैं. इस आदेश के तहत अमेरिका ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर दूसरे चरण की जांच को आगे बढ़ाने के लिए कहा है. जो बाइडन ने खुफिया एंजेंसियों से कहा है कि अपनी कोशिशों को तेज करें और 90 दिनों के अंदर ऐसी जानकारी जुटाएं, जिसके आधार पर किसी ठोस नतीजे के करीब पहुंचा जा सके. यानी अमेरिका ने इस बात की जांच शुरू कर दी है कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति कैसे और कहां हुई. इस जांच को निर्णायक फैसले तक ले जाने के लिए 90 दिनों का लक्ष्य रखा गया है. दो दिन बीत चुके हैं और 88 दिन बाकी हैं. इस आदेश में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ये भी कहा है कि चीन में स्वतंत्र विशेषज्ञों को वास्तविक डेटा और नमूनों तक पहुंच मिलनी चाहिए.

भारत समेत इन देशों ने किया जांच का पूरा समर्थन

इस पर भारत का रुख भी यही है. भारत सरकार (Indian Government) ने पहली बार आधिकारिक बयान में कहा है कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर अभी जांच की और जरूरत है. इसके अलावा 26 मई को जिनोवा में हुई वर्ल्ड हेल्थ असेंबली (World Health Assembly) की बैठक में ब्रिटेन, यूरोपियन यूनियन, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने भी जांच की मांग का समर्थन किया है, और WHO को इस पर जोर देने के लिए कहा है. हालांकि आज आपके मन में भी ये सवाल होगा कि अचानक ये पूरा मामला एक इतनी बड़ी खबर कैसे बन गया? क्योंकि पिछले कुछ समय से दुनिया के अधिकतर देशों ने चीन के दावों के साथ एडजस्ट करना शुरू दिया था. सभी देशों ने अपनी ऊर्जा कोरोना वायरस से निपटने में लगा दी थी. फिर चाहे वो हमारा देश ही क्यों ना हो. लेकिन अब इसकी मांग हो हो रही है, और इसके चार कारण हैं.

1. चीन को लेकर WHO का संदिग्ध रुख

दरअसल वायरस की उत्पत्ति को लेकर WHO पहले चरण की जांच पूरी कर चुका है, और मार्च में ही उसने इस पर एक रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट में WHO ने ये कहा था कि ‘कोरोना वायरस किसी लैब से पैदा हुआ है, ऐसा कहना मुश्किल है. जांच रिपोर्ट में WHO इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि शायद कोरोना वायरस चमगादड़ों के जरिए इंसानों में आया. यानी वायरस की उत्पत्ति को लेकर ये रिपोर्ट कुछ भी स्पष्ट नहीं कहती है. साथ ही चीन को संदेह का लाभ (Benefit Of Doubt) देती है. इसी वजह से अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और 13 दूसरे देशों की ओर से जारी संयुक्त बयान में WHO की इस रिपोर्ट पर चिंता जताई गई है, और कहा गया है कि इस रिपोर्ट को पारदर्शी और स्वतंत्र होना चाहिए. यानी आरोप है कि WHO ने चीन के दबाव में आकर ये रिपोर्ट तैयार की. आप कुछ बातों से इसे समझ सकते हैं.

– WHO के चीफ ने खुद को रिपोर्ट से किया अलग
WHO के चीफ टेड्रोस अदनोम (Tedros Adhanom) ने मार्च महीने में जारी की गई इस रिपोर्ट से खुद को अलग कर लिया है. उन्होंने अपने एक बयान में कहा है कि चीन ने उनकी टीम से डेटा को छिपाया था और लैब लीक थ्योरी पर और जांच की आवश्यकता है. उन्होंने ये भी कहा था कि डब्ल्यूएचओ इन सभी थ्योरी पर अध्ययन कर रहा है. यानी डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट से डब्ल्यूएचओ के चीफ ने ही खुद को अलग कर लिया है.

– लैब से वायरस फैलने की बात को WHO ने नकारा
इसी साल जनवरी में चीन और डब्ल्यूएचओ की संयुक्त टीम ने कई संस्थानों का दौरा किया था. इस दौरान ये टीम वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (Wuhan Institute of Virology) भी पहुंची थी. ये वही रिसर्च इंस्टिट्यूट है, जहां लैब से कोरोना वायरस की उत्पत्ति का दावा किया जाता है. लेकिन इसे लेकर डब्ल्यूएचओ ने कोई ठोस जानकारी नहीं दी. बड़ी बात ये है कि डब्ल्यूएचओ ने पूरी तरह से भी इस बात को नहीं नकारा कि ये वायरस वुहान की इसी लैब से फैला है.

– चीन के कहने पर WHO ने बनाई फर्जी जांच रिपोर्ट?
डब्ल्यूएचओ पर चीन के दबाव की आशंका इसलिए भी जताई जा रही है क्योंकि जब WHO के 13 विशेषज्ञों की टीम चीन पहुंची थी तो दो विशेषज्ञों को चीन ने वुहान पहुंचने से पहले ही रोक दिया था. तब चीन ने इन लोगों के कोरोना संक्रमित होने की संभावना जताई थी और कहा था कि इनके शरीर में एंटीबॉडिज (Antibodies) मिली है. लेकिन आरोप लगते हैं कि चीन ने ऐसा करके पूरी जांच को ही सेट कर दिया. आप सुनते होंगे कि परीक्षा में Question Paper सेट किया गया है. इसका मतलब होता है कि परीक्षा में जो प्रश्न आएंगे, वो पहले से ही तय हैं और छात्रों को पता चल गए हैं. चीन ने भी इस जांच को अपने हिसाब से सेट किया और फिर इस जांच की रिपोर्ट भी वैसी आई, जैसी चीन चाहता था. और आरोप है कि WHO ने इस पर चीन की खूब मदद की.

– जांच वैज्ञानिकों का आरोप, चीन ने नहीं दिखाया डेटा
इसके अलावा फरवरी में भी डब्ल्यूएचओ की एक टीम वुहान गई थी. इस टीम में शामिल एक सदस्य और माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉमिनिक ड्वायर (Dominic Dwyer) ने ये कहा था कि चीन ने डब्ल्यूएचओ के साथ वायरस से संबंधित सभी डेटा साझा नहीं किया. इसके अलावा एक और सदस्य थिया कोलसेन फिशर (Thea Kolsen Fischer) ने भी यही आरोप लगाए थे, और कहा था कि जांच को चीन ने प्रभावित किया था. उन्होंने उस समय जांच के लिए अत्यधिक राजनीतिक (Highly Geopolitical) शब्द का इस्तेमाल किया था. यानी पहला कारण चीन को लेकर WHO का संदिग्ध रुख है, जिसने वायरस की उत्पत्ति को लेकर जांच की मांग तेज कर दी है.

2. लैब थ्योरी के सिर्फ 4 पन्ने ही हुए लीक

चीन को लेकर शक का दूसरा कारण है दुनियाभर के 18 वैज्ञानिकों द्वारा साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ लेख. इस लेख में इन वैज्ञानिकों ने कहा था कि WHO की जांच रिपोर्ट संतुलित और निष्पक्ष नहीं है. उन्होंने अध्ययन करते हुए बताया कि डब्ल्यूएचओ की ये रिपोर्ट है तो 113 पन्नों की लेकिन इन 113 पन्नों में सिर्फ चार पन्नों पर ही लैब लीक थ्योरी की बात की गई है. यानी ये रिपोर्ट सही नहीं हो सकती और इसकी जांच होनी चाहिए.

3. कोरोना पर 2015 से रिसर्च कर रहा चीन!

चीन को लेकर शक का तीसरा कारण है ऑस्ट्रेलिया के एक अखबार में हाल ही में छपी एक रिपोर्ट. इस रिपोर्ट में चीन की सेना PLA द्वारा तैयार किए गए एक रिसर्च पेपर के बारे में बताया गया, जिसमें चीन के वैज्ञानिक वर्ष 2015 में कोरोना वायरस को जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने पर चर्चा कर रहे थे. यानी वर्ष 2015 में ही इस पर चीन ने शोध कर लिया था.

4. चीन ने WHO और पूरी दुनिया से बोला झूठ

चीन में स्वतंत्र जांच का चौथा कारण है अमेरिका के अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल में छपी एक रिपोर्ट. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2019 के नवंबर महीने में वुहान लैब में काम करने वाले तीन शोधकर्ताओं की तबियत खराब हुई थी. इन तीनों शोधकर्ताओं में वही लक्षण देखे गए थे, जो कोरोना से संक्रमित होने पर किसी व्यक्ति में दिखते हैं. चीन ने पहली बार 3 जनवरी 2020 को WHO को इस पर जानकारी दी थी और इसमें कहीं भी कोरोना वायरस के नाम का जिक्र नहीं किया था. यानी इस रिपोर्ट कहती है कि चीन ने WHO और पूरी दुनिया से झूठ बोला. ये जानकारी पिछले साल अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट ने एक फैक्ट-शीट में दी थी. हालांकि चीन इससे इनकार कर चुका है. उसने इस रिपोर्ट को ध्यान भटकाने वाला बताया है. जबकि अमेरिका का रुख इस पर स्पष्ट है, और वो जांच की मांग कर रहा है. 

350 करोड़ खर्च कर बनी लैब में तैयार हुआ कोरोना!

कोरोना वायरस की उत्पत्ति की बात वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट के लैब से बताई जाती है. इस लैब से मात्र 5 KM की दूरी पर वुहान का सी फूड मार्केट है. यानी संभव है कि ये वायरस इस लैब से इस मार्केट में पहुंचा हो. वुहान का ये वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट लगभग 60 वर्ष पुराना है. इसकी स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी. उस समय इस इंस्टीट्यूट का नाम था वुहान माइक्रोबायोलॉजी लेबोरेटरी. इस इंस्टीट्यूट की जिस लैब में कोरोना वायरस को विकसित करने का शक है, वो वर्ष 2003 में 44 मिलियन डॉलर यानी साढ़े तीन सौ करोड़ की लागत से तैयार हुई थी. ये चीन की अकेली B.S.L 4 लैब है. इसका मतलब है बायो सेफ्टी लेवल 4 (Bio Safety Level 4). इस लेवल की लैब में सबसे खतरनाक वायरस पर अध्ययन किया जाता है.

इस लैब का कोरोना वायरस से बहुत तगड़ा कनेक्शन

इसका मतलब है कि ये पूरे चीन की इकलौती ऐसी लैब है, जिसमें कोरोना वायरस पर अध्ययन हो सकता था. ऐसा हुआ भी. इस लैब में वर्ष 2014 से कोरोना वायरस पर शोध हो रहा था और इसका जिक्र ऑस्ट्रेलिया के एक अखबार की रिपोर्ट में मिलता है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन में वर्ष 2015 में कोरोना वायरस को जैविक हथियार के रूप में विकसित करने के लिए एक रिसर्च पेपर तैयार हुआ था, जिसमें इस लैब के कुछ वैज्ञानिक भी हिस्सा ले रहे थे. यानी इस लैब का कोरोना वायरस से बहुत तगड़ा कनेक्शन है.

चीन ने ही दिया था वायरस का जीनोम सिक्वेंसिंग

महत्वपूर्ण बात ये है कि जनवरी 2020 में जब चीन ने पहली बार कोरोना वायरस का जीनोम सिक्वेंसिंग (Genome Sequencing) दुनिया के साथ साझा किया था, तब ये काम भी वुहान लैब के वैज्ञानिकों ने किया था. शक है कि वुहान लैब से कोरोना वायरस पूरी दुनिया में फैला, इसलिए भी सच साबित हो सकता है क्योंकि WHO मान चुका है कि 2004 का SARS कोरोना वायरस भी बीजिंग की वायरोलॉजी लैब से लीक हुआ था. तब डब्ल्यूएचओ ने ये भी कहा था कि ये वायरस इस लैब से एक नहीं दो-दो बार लीक हुआ था.

वर्ष 2003 में जब SARS कोरोना वायरस फैला था, उसके लिए भी डब्ल्यूएचओ ने सिंगापुर की एक लैब को जिम्मेदार माना था. वो सिंगापुर की B.S.L.3 लैब थी. कहने का मतलब ये है कि वायरस का लैब से लीक होना नया नहीं है. चीन को लेकर शक की कई वजह हैं. जब से कोरोना वायरस आया है, तब से दुनिया में सभी देशों का स्टेट्स और उनकी परिस्थितियां इतनी तेजी से बदली हैं कि चीन को लेकर कई गंभीर प्रश्न उठते हैं. हम आपको अब जो जानकारी बताएंगे, वो आपको बहुत ध्यान से पढ़नी चाहिए.

दुनियाभर में 17 करोड़ लोग कोरोना से संक्रमित

कोरोना वायरस से अब तक पूरी दुनिया में 35 लाख 12 हजार 510 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 17 करोड़ लोग इस वायरस से संक्रमित हुए हैं. क्या इन मौतों के लिए चीन जिम्मेदार नहीं है? पिछले डेढ़ साल में पूरी दुनिया को कोरोना वायरस से 11.5 ट्रिलियन डॉलर यानी 862 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है. कोरोना वायरस की वजह से दिसंबर 2020 तक पूरी दुनिया में 25 करोड़ फुल टाइम जॉब्स खत्म हो गईं. ये आंकड़ा इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन का है.

दुनिया में 24 करोड़ बच्चे पढ़ाई छोड़ने को मजबूर

संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNESCO की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले भारत में ढाई करोड़ बच्चे कोरोना की वजह से पढ़ाई छोड़ सकते हैं. क्योंकि कोरोना ने इन बच्चों के माता पिता की आर्थिक स्थिति को तहस नहस कर दिया है. अगर पूरी दुनिया की बात करें तो 24 करोड़ बच्चे इस महामारी की वजह से पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं. यही नहीं कई वर्षों की मेहनत के बाद जो करोड़ों परिवार मीडिल क्लास की श्रेणी में आ गए थे, उन्हें भी इस वायरस ने कहीं का नहीं छोड़ा. पूरी दुनिया में 5 करोड़ 40 लाख परिवार मीडिल क्लास की श्रेणी से बाहर हो गए हैं और भारत में भी 3 करोड़ परिवार अब इस श्रेणी का हिस्सा नहीं हैं. ये स्टडी प्यू रिसर्च सेंटर ने की है.

3 करोड़ लोगों के सामने भुखमरी का संकट

इसके अलावा अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (Azim Premji University) के अध्ययन के मुताबिक, भारत में कोरोना वायरस ने लगभग 23 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा की तरफ धकेल दिया है. इस महामारी काल में नौकरियां जाने की वजह से गरीबी बढ़ गई और गरीबी की वजह से भुखमरी बढ़ गई. अंतर्राष्ट्रीय चैरिटेबल संस्था ऑक्सफैम के मुताबिक, पूरी दुनिया में कोरोना वायरस ने साढ़े तीन करोड़ लोगों के सामने भुखमरी का संकट खड़ा कर दिया है. यानी पिछले डेढ़ साल में कोरोना वायरस ने दुनिया को बदल कर रख दिया है. हमारा मानना है कि इन सभी लोगों को मिले इस कष्ट का मुजरिम पकड़ा जाना चाहिए. 

अगर इस वायरस की उत्पत्ति वुहान लैब में हुई तो ये सच सामने आना ही चाहिए और इसके लिए WHO को निष्पक्ष भूमिका निभानी होगी। जबकि वो ऐसा नहीं कर रहा है. WHO तो इस वायरस को वुहान वायरस या चीन वायरस कहने पर भी आपत्ति जताता है. इसे लेकर नियमों में बदलाव करने पर विचार कर रहा है. जबकि पूरी दुनिया में ऐसी कई बीमारियां हैं, जो जिन देशों, राज्यों और क्षेत्रों से फैली. उनका नाम भी उसी पर रखा गया. इसे कुछ उदाहरणों से समझिए.

1. स्पेनिश फ्लू (Spanish Flu) को ये नाम इसलिए मिला क्योंकि ये बीमारी पहली बार स्पेन में फैली थी.
2. जिका वायरस (Zika Virus) पहली बार वर्ष 1947 में इस वायरस की पहचान हुई थी. तब युगांडा के जिका के जंगल क्षेत्र में ये संक्रमण मिला था. इसीलिए इसे दुनिया ने जिका वायरस कहा.
3. इबोला वायरस (Ebola Virus) का नाम भी इसी तरह पड़ा. वर्ष 1976 में अफ्रीका महाद्वीप में Ebola नाम की नदी के पास ये संक्रमण पहली बार फैला था. जिसके बाद इस वायरस को इबोला वायरस कहा गया.
4. निपाह वायरस (Nipah Virus) का भी नामकरण हुआ मलेशिया के एक गांव है, जिसका नाम है निपाह. वहीं से ये वायरस पहली बरा फैला था और दुनिया ने इसीलिए इसे निपाह वायरस कहा.
5. मर्स-कोविड (MERS-CoVid) के नाम के पीछे भी कुछ ऐसी ही कहानी है. वर्ष 2012 में पहली बार इस वायरस की पहचान साउदी अरब में हुई थी. जिसके बाद इसे मर्स-कोविड कहा गया. 

इसका मतलब है मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस. जिस वायरस से इस समय पूरी दुनिया जूझ रही है, और जो चीन से फैला है. वो इसी वायरस के परिवार का सदस्य है. इसके अलावा और भी कई बीमारियां हैं, जिनके नाम उन्हीं देशों पर रखे गए, जहां से ये बीमारियां निकल कर दूसरे देशों में पहुंची. लेकिन कोरोना वायरस के मामले में ऐसा नहीं हुआ. ये चीन के वुहान शहर से दुनियाभर में फैला, लेकिन विडम्बना देखिए कि हर देश अब इसे एक स्ट्रेन के रूप में जानता है. जो अलग अलग देशों से आया है. लेकिन चीन का नाम अब कोई नहीं लेता.

महात्मा बुद्ध (Mahatma Buddha) ने कहा था कि चंद्रमा, सूर्य और सत्य अधिक देर तक छिप नहीं सकते. चीन ने अब तक कई कोशिशें की और वो इन कोशिशों में कामयाब भी हुआ है. लेकिन हमारा मानना है कि वो सच को हमेशा के लिए छिपा कर नहीं रख सकता. अब उसके झूठ का काउंटडाउन शुरू हो चुका है. अमेरिका ने 90 दिनों का लक्ष्य रखा है सच सामने लाने के लिए और दो दिन बीत चुके हैं. यानी अब 88 दिन बचे हैं और चीन को ये काउंटडाउन बहुत ध्यान से देखना चाहिए.

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