DNA ANALYSIS: दुनिया में सबसे अधिक आबादी होने के बावजूद चीन क्‍यों बढ़ाना चाहता है जनसंख्‍या?

नई दिल्ली: पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी के मामले में चीन, भारत और अमेरिका टॉप तीन की सूची में आते हैं. लेकिन जिस चीन ने जनसंख्या नियंत्रण को लेकर दुनिया की सबसे विवादास्पद नीति को अपने देश में लागू किया, आज वो अपनी जनसंख्या बढ़ाना चाहता है और चीन में थर्ड चाइल्ड पॉलिसी (Third Child Policy) भी अब आ गई है. अमेरिका में भी कई विशेषज्ञों ने आबादी को 100 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य जरूरी बताया है जबकि भारत के लिए बढ़ती जनसंख्या सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन इसके नियंत्रण को लेकर हमारा देश कई दशकों से खुद को लाचार महसूस करता है. 

भारत जब आजाद हुआ था, तब उसकी आबादी लगभग 36 करोड़ थी लेकिन पिछले 73 वर्षों में हमारे देश की आबादी 100 करोड़ बढ़ गई. इसका नियंत्रण आज भारत के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है. इसलिए आज हम जनसंख्या को लेकर दुनिया के इन तीन बड़े देशों की स्थिति का विश्लेषण करेंगे और आपको बताएंगे कि अगर जनसंख्या स्थिर ना हो तो कैसे एक देश बीमार बन जाता है और इस बीमारी के इलाज में वर्षों लग जाते हैं.

दुनिया की 18.47% आबादी चीन में

इस समय पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है चीन. 144 करोड़ की आबादी के साथ चीन इस सूची में पहले स्थान पर है. दूसरे स्थान पर है भारत, जहां कुल आबादी 139 करोड़ है और तीसरे स्थान पर है अमेरिका. अमेरिका की कुल आबादी 33 करोड़ है. यानी इस हिसाब से देखें तो पूरी दुनिया की कुल आबादी में 18.47 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन का है. भारत की हिस्सेदारी 17.7 प्रतिशत है और अमेरिका की हिस्सेदारी 4.25 प्रतिशत है. लेकिन जनसंख्या को लेकर इन तीनों देशों की नीतियां अलग-अलग हैं.

जनसंख्या को लेकर क्या है चीन का नजरिया

चीन दुनिया का पहला ऐसा देश है, जिसने जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कड़े कानून बनाए. वर्ष 1979 में One Child Policy लागू की. ये पालिसी 37 वर्षों तक चीन में लागू रही. फिर चीन ने इसमें कुछ नरमी बरती और वर्ष 2016 में Second Child Policy लेकर आया और आज ये पॉलिसी भी उसने बदली दी है. अब चीन पूरे देश में Third Child Policy लाने वाला है. मतलब लोग अब तीन बच्चों को जन्म दे सकेंगे. पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या को लेकर चीन का नजरिया पूरी तरह बदल गया है. पहले वो जनसंख्या नियंत्रित करना चाहता था और अब वो जनसंख्या बढ़ाना चाहता है. 

ऐसा अनुमान है कि भारत वर्ष 2027 तक चीन को सबसे ज्यादा आबादी के मामले में पीछे छोड़ देगा और इसीलिए हमारे देश में जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर अक्सर चर्चा होती है और विशेषज्ञ इसे जरूरी मानते हैं. यानी चीन जनसंख्या बढ़ाना चाहता है और भारत के लिए जनसंख्या का बढ़ना एक चिंता का विषय है और इसे लेकर कड़े कानून की चर्चा होती रहती है और ये चर्चा नई नहीं है.

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जनसंख्या बढ़ाना चाहता है अमेरिका

भारत के लिए जरूरी है कि वो अपनी जनसंख्या को नियंत्रित करे तो अमेरिका अपनी जनसंख्या को बढ़ाना चाहता है. अमेरिका में लगातार गिरती जन्मदर से विशेषज्ञ परेशान हैं और कई रिपोर्ट्स कहती हैं कि अमेरिका को अब आर्थिक ताकत बढ़ाने के साथ अपनी आबादी भी 33 करोड़ से 100 करोड़ करनी होगी.

चीन में थर्ड चाइल्ड पॉलिसी

यानी दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले तीन बड़े देशों के सामने आज जनसंख्या को लेकर अलग अलग चुनौतियां हैं और आज हम इन्हीं चुनौतियों के बारे में आपको बताना चाहते हैं. आज हम आपको ये बताएंगे कि जनसंख्या को लेकर दुनिया का नजरिया कितना बदल गया है? और हमारे इस विश्लेषण का आधार है, चीन में आई Third Child Policy. चीन के सरकारी मीडिया का कहना है कि वहां सरकार जल्द Third Child Policy को लागू कर देगी. 

इस पॉलिसी के तहत शादी के बाद लोग तीन बच्चों को जन्म दे पाएंगे. दरअसल पिछले दिनों चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों की एग्जीक्यूटिव कमीटि की एक बैठक हुई थी, जिसे Politburo भी कहा जाता है. इस बैठक में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी मौजूद थे. इसमें ये कहा गया कि चीन में राष्ट्रीय जन्मदर लगातार गिर रही है और ये 1 प्रतिशत के आसपास हो गई है जबकि चीन तेजी से बूढ़ा हो रहा है. इसे देखते हुए ही Third Child Policy को लेकर चीन ने स्थिति स्पष्ट कर दी है. यानी अब ये नई नीति जल्द वहां लागू हो जाएगी.

क्यों जनसंख्या बढ़ाना चाहता है चीन?

पहला कारण- चीन में जनसंख्या वृद्धि की दर में ऐतिहासिक गिरावट. अनुमान है कि चीन की आबादी का पीक वर्ष 2025 से 2030 के बीच आएगा. इस दौरान चीन की आबादी 145 करोड़ से 150 करोड़ के बीच रह सकती है. लेकिन इस पीक के बाद चीन की जनसंख्या कम होनी शुरू हो जाएगी.

वर्ष 1979 में जब चीन One Child Policy लाया था, तब चीन की राष्ट्रीय जन्म दर 5.9 प्रतिशत थी. लेकिन One Child Policy की वजह से वर्ष 1990 आते आते राष्ट्रीय जन्मदर 1.7 प्रतिशत रह गई. वर्ष 2016 में जब चीन में Second Child Policy आई तब भी उसका कोई फर्क नहीं पड़ा. आज चीन की राष्ट्रीय जन्म दर घट कर सिर्फ 1.3 प्रतिशत हो गई है. जबकि भारत की राष्ट्रीय जन्म दर 2.2 प्रतिशत है. अब यहां समझने वाली बात ये है कि जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए राष्ट्रीय जन्मदर कम से कम 2.1 प्रतिशत होनी चाहिए. लेकिन चीन की है 1.3 प्रतिशत. यानी गिरती जन्मदर चीन के लिए चिंता का विषय है. 

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आंकड़ों पर एक नजर

– वर्ष 2016 में चीन में 1 करोड़ 79 लाख बच्चों ने जन्म लिया
– 2019 में इसमें गिरावत आई है और इस साल चीन में 1 करोड़ 46 लाख बच्चों ने ही जन्म लिया.
– वर्ष 2020 में भी ये गिरावट जारी रही. तब एक साल में 1 करोड़ 20 लाख बच्चों ने ही जन्म लिया. 60 वर्षों में पहली बार चीन में इतने कम बच्चे पैदा हुए.
– इससे पहले वर्ष 1961 में चीन में 1 करोड़ 20 लाख बच्चों ने जन्म लिया था. हालांकि तब के हिसाब से ये संख्या ज्यादा थी.

दूसरा कारण- कामगारों की घटती संख्या. किसी भी देश की आर्थिक तरक्की के लिए जरूरी है कि वहां की कुल आबादी में 15 वर्ष से 60 वर्ष के लोगों की संख्या ज्यादा हो. चीन में इस उम्र की श्रेणी के लोगों की आबादी तेजी से घट रही है. पिछले 10 वर्षों में इस उम्र के लोगों की हिस्सेदारी चीन की कुल आबादी में 70 प्रतिशत से कम हो कर लगभग 63 प्रतिशत हो गई है. जबकि बूढ़े लोगों की आबादी तेजी से बढ़ रही है. वर्ष 2010 में चीन की कुल आबादी में 13 प्रतिशत लोग बूढ़ थे. लेकिन वर्ष 2020 में ये आंकड़ा बढ़ कर 18.7 प्रतिशत हो गया है. यानी चीन में राष्ट्रीय जन्म दर गिर रही है और वो तेज़ी से बूढ़ हो रहा है.

इसी वजह से चीन में कामगारों की आबादी पर बहुत ज्यादा असर पड़ा है. बड़ी बात ये है कि किसी भी देश के लिए बूढ़ा होना उसके अस्वस्थ होने का संकेत होता है और यही वजह है कि ये आंकड़े चीन को चितित कर रहे हैं.

चीन में जनसंख्या का इतिहास

1960 के दशक में चीन में बड़ी प्राकृतिक आपदा आई थी. तब वहां बड़े पैमाने पर सूखा पड़ा था. इस सूखे की वजह से वर्ष 1959 से 1961 के बीच 3 करोड़ लोग भूख से मर गए थे. और इस सूखे के बाद ही चीन के विशेषज्ञों ने कहा था कि अगर चीन में आबादी को नियंत्रित नहीं किया गया तो इतने सारे लोगों के लिए खाना पैदा करना और उन्हें नौकरी देना सम्भव नहीं होगा. इसके बाद जनसंख्या नियंत्रण को चीन ने गम्भीरता से लेना शुरू किया.

चीन में जनसंख्या को लेकर दुनिया की सबसे विवादास्पद नीति की शुरुआत वर्ष 1979 में हुई. तब चीन One Child Policy लेकर आया था. इस नीति के तहत एक बच्चे को जन्म देने की ही इजाजत थी. ये नीति चीन में वर्ष 2016 तक लागू रही. और चीन का कहना है कि इस नीति की मदद से उसने लगभग 37 वर्षों में 40 करोड़ बच्चों के जन्म को रोक दिया. सोचिए अगर ये बच्चे जन्म लेते तो आज चीन की आबादी 170 से 180 करोड़ के बीच होती.

चीन अपने लक्ष्य में तो सफल रहा लेकिन वर्ष 2016 में उसे अहसास हुआ कि लगातार घटती जन्मदर उसे बूढ़ा बना देगी. इसी को देखते हुए उसने Two Child Policy को मंजूरी दी. लेकिन पिछले पांच वर्षों में इस नीति का कोई खास असर नहीं दिखा और यही वजह है कि चीन आज Third Child Policy लेकर आ रहा है.

चीन की सेकेंड चाइल्ड पॉलिसी क्यों हुई फेल? 

इसका सबसे बड़ा कारण है वहां लोगों की शादी और बच्चों में खत्म होती रूचि. चीन में अब काफी युवा शादी नहीं कर रहे हैं. वहां कई प्रांतों में युवाओं के बीच शादी नहीं करने का एक ट्रेंड सा बन गया है. बड़ी बात ये है कि युवाओं को नौकरी के लिए भी वहां संघर्ष करना पड़ रहा है. इसे देखते हुए चीन में पुरुषों को 60 और महिलाओं को 50 वर्ष की उम्र में रिटायर करने का दबाव सरकार पर बढ़ गया है.

अनुमान है कि वर्ष 2036 तक चीन ने रिटायरमेंट नीति नहीं बदली तो हालात बेहद खराब हो जाएंगे. इससे नए लोगों को रोजगार मिलना मुश्किल हो जाएगा. यही नहीं अगर दबाव में चीन ने ये रिटायरमेंट नीति अपना भी ली है तो उसके सामने इन लोगों को रिटायरमेंट पेंशन देना एक बड़ी चुनौती होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के लिए इतना पेंशन फंड जुटा पाना मुश्किल होगा.

ये देश बढ़ाना चाहते हैं जनसंख्या

यानी आज जनसंख्या को लेकर चीन का रुख पूरी तरह बदल गया है. अब वो जनसंख्या घटाना नहीं, बढ़ाना चाहता है. और इस रेस में वो अकेला नहीं है. अमेरिका भी है. अमेरिका में विशेषज्ञों और कई रिपोर्ट्स का कहना है कि अमेरिका को आर्थिक तरक्की के साथ अपनी आबादी को भी बढ़ाना होगा.

अमेरिका में जन्मदर 112 साल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है. अमेरिका में कुछ समय पहले तक राष्ट्रीय जन्मदर 2.1 प्रतिशत थी और इतनी जन्मदर को आदर्श माना जाता है लेकिन अब ये कम होकर 1.6 प्रतिशत हो गई है. अमेरिका के अलावा यूरोप के भी कई देशों में जन्मदर गिर रही है. इटली में तो पहली बार लगे लॉकडाउन के दौरान जन्मदर में करीब 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी. यानी ये देश अपनी जनसंख्या बढ़ाना चाहते हैं और इनमें से कुछ देशों ने कदम उठाने भी शुरू कर दिए हैं. 

जैसा दक्षिण कोरिया ने जन्मदर बढ़ाने के लिए अरबों रुपये खर्च कर दिए हैं. लेकिन इसके बावजूद अनुमान है कि 2067 तक दक्षिण कोरिया की आबादी कम होकर 3.9 करोड़ रह जाएगी और लोगों की औसत उम्र 62 वर्ष होगी. यानी दक्षिण कोरिया बूढ़ा देश बन जाएगा.

भारत के लिए जनसंख्या बनी चुनौती

हालांकि अगर भारत की बात करें तो भारत के सामने आज चुनौती जनसंख्या को बढ़ाना नहीं बल्कि जनसंख्या को नियंत्रित करना है. वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त के मौके पर लाल किले से दिए अपने भाषण में कहा था कि भारत को जनसंख्या विस्फोट से कई परेशानियां का सामना करना पड़ेगा. उन्होंने ये भी कहा था कि जो लोग छोटा परिवार रखते हैं, वो देश के विकास में भी योगदान देते हैं और ये भी देशभक्ति है.

परिवार नियोजन भी देशभक्ति

यानी प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी खुद मानते हैं कि परिवार नियोजन भी अपने आप में देशभक्ति है. लेकिन इसके बावजूद आज भारत जनसंख्या विस्फोट की समस्या से जूझ रहा है. वर्ष 1947 में जब हमारा देश आजाद हुआ था, तब हमारे देश की आबादी थी लगभग 36 करोड़ लेकिन आज ये 100 करोड़ बढ़ गई है. सोचिए पिछले 73 वर्षों में 100 करोड़ आबादी बढ़ गई है हमारे देश की और ये अधिक आबादी भारत के स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं है.

बड़ी बात ये है कि आजादी के बाद से अब तक देश की संसद में 35 बार जनसंख्या नियंत्रण को लेकर बिल पेश हो चुका है लेकिन आज तक ये बिल कानून की शक्ल नहीं ले पाया. दिसम्बर 2018 में भी बीजेपी सांसद संजीव बाल्यान ने संसद में जनसंख्या नियंत्रण बिल पेश किया था, जिसे 125 सांसदों का समर्थन प्राप्त हुआ लेकिन ये बिल पास नहीं हो पाया.

हम दो हमारे दो का नारा

ऐसा नहीं है कि भारत में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कभी विचार नहीं किया गया. 1970 के दशक में जनसंख्या नियंत्रण की कोशिशें हुईं और इमरजेंसी के दौरान अमानवीय तरीके से लोगों की नसबंदी भी की गई लेकिन ये कोशिशें अंसवैधानिक थीं इसलिए लोगों का समर्थन इसमें कभी नहीं मिला. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने परिवार नियोजन के लिए हम दो हमारे दो का नारा भी दिया और इस नारे ने चर्चा भी बटोरी. लेकिन इसका भी प्रभाव नहीं दिखा.

इसके अलावा फिल्मों के माध्यम से भी लोगों को इस पर जागरूक करने की कोशिशें हुईं लेकिन सफलता नहीं मिली. आज जहां भारत जनसंख्या नियंत्रण को लेकर अनेक विकल्पों पर विचार कर रहा है तो अधिकतर देश जनसंख्या बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं. ये वो देश हैं, जो पहले जनसंख्या नियंत्रण चाहते थे लेकिन अब इनका नजरिया बदल गया. 

जनसंख्या को लेकर क्यों बदला नजरिया? 

-1960 के दशक में दुनिया में भोजन का गभीर संकट था. भारत और चीन जैसे देशों में भुखमरी और कुपोषण आम बात थी. ऐसे में आबादी को इसका सबसे बड़ा कारण माना गया था. लेकिन 1970 के दशक में भारत की हरित क्रान्ति ने ये साबित किया कि खाद्य उत्पादन को बिना जमीन के विस्तार के कई गुना बढ़ाया जा सकता है. आज के आधुनिक दौर में दुनिया कुल आबादी से ज्यादा लोगों का पेट भरने में सक्षम है. इसीलिए आबादी बढ़ाने को आज कई देश सही मानते हैं.

– लेबर सप्लाई: ज्यादा आबादी का मतलब है कि उस देश के पास कामगारों की एक बड़ी फौज होती है. आर्थिक तरक्की के लिए कामगारों की एक बड़ी फौज होना जरूरी है. अमेरिका और चीन के इतिहास से ये साफ है कि उनकी आर्थिक तरक्की तब ज्यादा हुई, जब उनकी जनसंख्या बढ़ी.

– जितने ज्यादा लोग काम करेंगे, वो फिर उतनी ज्यादा बचत भी करते हैं. इससे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और विकास के लिए पूंजी की कभी कमी नहीं होती.

– जितनी बड़ी आबादी, उतने ज्यादा उपभोक्ता और उतनी ही ज्यादा मांग. उदाहरण के लिए भारत. हालांकि भारत के लिए आज जनसंख्या नियंत्रण सबसे जरूरी है. लेकिन हमारे देश की राजनीति इस विषय की गंभीरता को कभी नहीं समझ पाई.

भारत को गंभीरता से सोचने की जरूरत

आज हम आपसे यही कहना चाहते हैं कि चीन अपनी जनसंख्या को लेकर हर दौर में गंभीर रहा है लेकिन भारत ने कभी ऐसा नहीं किया. इसलिए आज जब चीन तीन बच्चों की नीति लेकर आया है और अपनी जनसंख्या बढ़ाना चाहता है, तब भारत को भी इस विषय पर गौर करना चाहिए और जनसंख्या नियंत्रण को लेकर ठोस कदम उठाने चाहिए. आपको हमेशा ये बात याद रखनी है, जिसे देश की जनसंख्या नियंत्रित नहीं होती, वो देश कभी स्थिर नहीं रहता और उस देश में आए दिन नए-नए संकट और मुश्किलें बढ़ती रहती हैं.

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