DNA ANALYSIS: Corona Vaccine लगवाने से क्यों डर रहे लोग? जानिए वैक्सीनेशन से जुड़ी ये अहम बातें

नई दिल्ली: इस समय हमारे देश में दो चीजों की सबसे ज्यादा कमी है.पहली कमी है, वैक्सीन की और दूसरी कमी है वैक्सीन को लेकर विश्वास की. महत्वपूर्ण बात ये है कि विश्वास की कमी, वैक्सीन की कमी पर हावी है और कई राज्यों में लोग वैक्सीन उपलब्ध होते हुए भी इसे लगवाने से डर रहे हैं.

भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान के तहत देश में हर एक व्यक्ति को 16 वर्ष की उम्र तक अलग अलग बीमारियों की 15 से अधिक वैक्सीन लग जाती हैं. यानी कोरोना पहली वैक्सीन नहीं है, जो लोगों को लगाई जा रही है. लेकिन इसके बावजूद बहुत से लोग कोरोना की वैक्सीन को लेकर डरे हुए हैं. इसीलिए आज हम इसी डर के बारे में आपको बताएंगे और वैक्सीन से जुड़ी अफवाहों का भी DNA टेस्ट करेंगे.

वैक्सीन को लेकर विश्ववास की कमी

 

इस समय देश में 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को वैक्सीन लगाई जा रही है. इन लोगों के लिए दो वैक्सीन उपलब्ध हैं. एक है Covishield और दूसरी है Covaxin.

अब समस्या ये है कि एक तरफ वैक्सीन की कमी है और दूसरी तरफ बहुत से ऐसे लोग हैं, जो वैक्सीन उपलब्ध होते हुए भी नहीं लगवा रहे हैं.

ऐसे लोगों के मन में वैक्सीन को लेकर पांच बड़े डर हैं-

पहला डर- वैक्सीन लगवाने से मौत हो जाएगी

दूसरा डर- वैक्सीन लगवाने से कोरोना वायरस हो जाएगा

तीसरा डर- वैक्सीन की जगह कोई और दवाई तो नहीं लगा दी जाएगी?

चौथा डर- वैक्सीन के Side Effects से कई तरह की बीमारी हो जाती हैं

और पांचवां डर – वैक्सीन से आने वाली नस्ल खराब हो जाएगी.

डर को खत्म करने वाली वैक्सीन

आप इसे ऐसे समझिए कि ये वो पांच मसाले हैं, जिनकी मदद से वैक्सीन को लेकर अफवाह की एक अच्छी सी डिश तैयार की गई है और ये डिश अब कई लोगों को स्वाद में अच्छी भी लग रही है और वो वैक्सीन नहीं लगवाना चाहते. लेकिन आज हम आपको इस डर को खत्म करने वाली वैक्सीन के बारे में बताएंगे. ये वैक्सीन पांच बातों से मिल कर तैयार होती है.

पहली बात वैक्सीन से मौत नहीं होती. वैक्सीन जीवन बचाने के लिए है, ये जानें लेने के लिए नहीं है. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, इस तरह के सभी दावे गलत हैं, जो ये कहते हैं कि वैक्सीन लगवाने से मौत हो जाती है. सच तो ये है कि वैक्सीन की वजह से बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होने के बाद भी सुरक्षित रहे हैं और वायरस का उन पर ज्यादा असर नहीं हुआ है. यानी पहली बात ये है कि वैक्सीन जान बचाती है, ये जान लेती नहीं है.

दूसरी बात वैक्सीन लगवाने से कोरोना का संक्रमण नहीं होता है. वैक्सीन शरीर में Neutralizing Antibodies बनाती है. कहने का मतलब ये है कि वैक्सीन लगवाने के बाद भी कोरोना का संक्रमण हो सकता है, लेकिन ये संक्रमण जब शरीर में प्रवेश करेगा, तब उसका मुकाबला पहले से मौजूद Neutralizing Antibodies से होगा, जो वैक्सीन से शरीर में बनती हैं. यानी दूसरी बात ये है कि वैक्सीन से कोरोना वायरस नहीं होता, बल्कि ये कोरोना होने पर आपको गंभीर रूप से बीमार होने से बचाती है.

तीसरी बात भारत में अप्रैल महीने के अंत तक 73 हजार 600 टीकाकरण केन्द्र थे. इन टीकाकरण केन्द्रों पर वैक्सीन लगाने की ज़िम्मेदारी प्रशासन की है और स्वास्थ्य विभाग और दूसरी इकाइयां भी इसका ध्यान रख रही हैं. बड़ी बात ये है कि वैक्सीन की वायल में कोई और दवाई हो ही नहीं सकती और अब तक इस तरह का कोई मामले भी नहीं आया है. आप चाहें तो वैक्सीन लगवाने से पहले टीकाकरण केन्द्र पर एक बार वायल्स को चेक कर सकते हैं और इस पर और जानकारी ले सकते हैं. यानी तीसरी बात ये है कि वैक्सीनेशन सेंटर्स पर आपको वैक्सीन ही लगाई जाएगी और आपको इस पर विश्वास करना होगा.

चौथी बात वैक्सीन के Side Effects अब तक कुछ ही लोगों में देखे गए हैं. यहां आपको जो बात समझनी है कि एलोपैथी में हर दवाई के Side Effects होते हैं. आपको जो दवाई बुखार में लेते हैं उसके भी Side Effects होते हैं. लेकिन अधिकतर मामलों में इनका असर इतना ज्यादा नहीं होता. यानी चौथी बात ये है कि ये दावा कि वैक्सीन के Side Effects से गंभीर बीमारियां हो जाती हैं, ये सही नहीं है और कई रिसर्च में भी ये कहा गया है.

और पांचवीं बात ये है कि वैक्सीन से नस्ल खराब हो जाती है. ये पूरी तरह झूठ है और एक अफवाह है. इस अफवाह पर आपको यकीन नहीं करना चाहिए.

देश में वैक्सीनेशन का इतिहास

 

आप एक और जानकारी से अपने मन में वैक्सीन को लेकर बैठे इस डर को डिलीट कर सकते हैं. भारत में हर एक व्यक्ति को 16 वर्ष की उम्र तक 15 से अधिक वैक्सीन लग चुकी होती हैं. सोचिए 15 से अधिक वैक्सीन. यानी कोरोना पहली वैक्सीन नहीं है, जो आपको लगाई जा रही है.

जन्म के बाद बच्चों को कई वैक्सीन लगाई जाती हैं. इनमें पांच प्रमुख हैं-

-पहला टीका होता है टीबी का, जिसे BCG वैक्सीन कहते हैं.

-दूसरा टीका होता है, Hepatitis b का.

-तीसरा टीका होता है पोलियो का. बच्चों को पोलियो की बूंद चार बार पिलाई जाती हैं. पहले जन्म के 15 दिन बाद, फिर उसके 6 हफ़्ते बाद, फिर 10 हफ़्ते बाद और फिर 14 हफ़्ते बाद.

-चौथी वैक्सीन होती है Haemophilus influenzae की. ये जन्म के 6 हफ़्ते बाद और फिर उसके 14 हफ़्ते बाद लगाई जाती है.

-और पांचवीं वैक्सीन होती है, रोटा वायरस की. ये भी जन्म के 6 हफ़्ते बाद लगनी शुरू होती है और इसकी तीन अलग अलग समय पर डोज लगती है. 

-बच्चा जब 9 महीने का हो जाता है तो उसे दो वैक्सीन लगती हैं.

-पहला टीका होता है, Vitamin A का.

-और दूसरा टीका होता है Rubeola का.

-बच्चा जब 16 से 24 महीनों का हो जाता है, तो तब भी उसे कई वैक्सीन लगती हैं.

-इनमें प्रमुख है, Japanese Encephalitis का टीका.

-इसके अलावा इस उम्र में DPT Booster भी लगता है. ये भी एक तरह का टीका होता है, ये टीका तीन बीमारियों से बचाता है. ये बीमारियां हैं, Tetanus, Diphtheria और Pertussis.

-बच्चों को 10 वर्ष और फिर 16 वर्ष की उम्र में भी Tetanus का टीका लगाया जाता है.

वैक्सीन से बीमारियों पोलियो और Neonatal Tetanus का खात्मा

भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान के तहत 16 वर्ष की उम्र तक बच्चों को 15 से अधिक वैक्सीन लग चुकी होती हैं. इसके बावजूद आज बहुत से लोग कह रहे हैं कि वो वैक्सीन नहीं लगवाएंगे, जबकि उनकी ये सोच उन्हें संक्रमण के खतरे की तरफ़ धकेल सकती है. यहां एक बात जो आपको समझनी है वो ये कि भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान की ताकत की वजह से देश में दो बीमारियां पोलियो और Neonatal Tetanus की बीमारी खत्म हो पाई है और ये वैक्सीन से ही संभव हुआ है.

हालांकि वैक्सीन को लेकर लोगों में विश्वास की कमी का भी अपना एक लम्बा इतिहास है.

जब देश में आई पहली वैक्सीन 

ये इतिहास तब से शुरू होता है, जब से पहली वैक्सीन आई. पहली वैक्सीन चेचक की थी. वर्ष 1796 में ब्रिटेन के मशहूर डॉक्टर Edward Jenner ने चेचक की वैक्सीन विकसित की थी. इसके बाद अंग्रेज़ों ने भारत में भी लोगों को चेचक की वैक्सीन लगाने के लिए बड़े स्तर पर अभियान शुरू किया. उस समय का एक दिलचस्प किस्सा हम आपको बताते हैं कि कैसे तब भी लोग वैक्सीन लगवाने से डर रहे थे.

वर्ष 1805 में देवजमनी पहली बार कृष्ण राज वाडियार तृतीय से शादी के लिए मैसूर के शाही दरबार में पहुंची थी, तब उनकी उम्र 12 वर्ष थी. कृष्णराज वाडियार तृतीय दक्षिण भारत के एक राज्य से नये-नये शासक बने थे, लेकिन देवजमनी को जल्द ही पता चल गया कि उन्हें एक बड़े और महत्वपूर्ण काम के लिए चुना गया है. ये काम था चेचक के टीके का प्रचार प्रसार करना. लोगों में चेचक के टीके का प्रचार-प्रसार करने के लिए और उन्हें इसके इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करने के मक़सद से ईस्ट इंडिया कंपनी ने देवजमनी की भूमिका को एक पेंटिंग के रूप में उतारा था.

इस चित्र में सबसे दाहिनी ओर खड़ी महिला की पहचान देवजमनी के तौर पर की जाती है, जो सबसे छोटी राजकुमारी थीं. ऐसा कहा जाता है कि देवजमनी की साड़ी सामान्य परिस्थिति में उनकी दाईं बाजू को ढक रही होती थी, लेकिन उन्होंने इस तस्वीर में अपने हाथ से साड़ी को हटाया हुआ है, ताकि वो ये दिखा सकें कि उन्हें टीका कहां लगाया गया है.

बाईं ओर खड़ी महिला राजा की पहली पत्नी हैं, जिनका नाम भी देवजमनी था. तस्वीर में उनकी नाक और होठों के आसपास का हिस्सा कुछ सफेद दिखाई देता है. ये आमतौर पर उन लोगों में देखने को मिलता है जिन्हें चेचक हुआ हो.

कहा जाता है कि उस समय राजकुमारी देवजमनी के चेचक का टीका लगवाने से काफी लोग प्रोत्साहित हुए थे और उनके मन में इसे लेकर डर खत्म हुआ था.

विदेश में भी हुआ वैक्सीन का विरोध

 

दिलचस्प बात ये है कि उस समय चेचक की वैक्सीन लगवाने से सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि इंग्लैंड में भी लोग डर रहे थे. इस डर की वजह से ही इंग्लैंड में वर्ष 1853 में वैक्सीनेशन एक्ट बनाया गया, जिसके तहत लोगों को चेचक का टीका लगवाना अनिवार्य था और ऐसा नहीं करने पर उन पर जुर्माना लगाया जाता था.

तब इस क़ानून का इंग्लैंड में काफी विरोध हुआ. वर्ष 1885 में इंग्लैंड के Leicester (लेस्टर) शहर में वैक्सीन के खिलाफ एक मार्च निकाला गया था और इस मार्च में 1 लाख लोगों ने हिस्सा लिया था. यही नहीं इसमें प्रतीकात्मक तौर पर एक बच्चे का ताबूत दिखाया गया था और वैक्सीन बनाने वाले डॉक्टर Edward Jenner का पुतला फूंका गया था.

महात्मा गांधी भी वैक्सीन के खिलाफ थे

 

 

आपको जानकर हैरानी होगी कि वर्ष 1913 में महात्मा गांधी ने भी वैक्सीन का विरोध किया था. ये बात उस समय की है, जब वो दक्षिण अफ्रीका में थे. तब वहां उन्होंने एक लेख लिखा था कि वैक्सीन किसी भी बीमारी का एक बदबूदार उपाय है और ये एक जहरीला अंधविश्वास है. यही नहीं, जब महात्मा गांधी भारत लौट आए, तब भी उन्होंने वैक्सीन का विरोध जारी रखा।

वर्ष 1929 में उन्होंने एक खत में लिखा था कि शाकाहारी इस तरह की वैक्सीन कैसे ले सकते हैं? हालांकि ये वो दौर था, जब भारत में चेचक की वैक्सीन से कई लोगों की जान बची.

धार्मिक कट्टरपंथ और अज्ञानता

आधुनिक युग में भी अलग अलग बीमारियों की वैक्सीन को लेकर विरोध हुए और वैज्ञानिक तरीकों की भी आलोचना हुई. पोलियो की बीमारी, जो भारत समेत दुनिया के अधिकतर देशों में खत्म हो चुकी है, उसका प्रभाव अब फिर से नाइजीरिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में दिखने लगा है. इन देशों में धार्मिक कट्टरपंथ और अज्ञानता की वजह से लोग पोलियो की वैक्सीन का विरोध करते हैं.

अकेले पाकिस्तान में वर्ष 2012 से अब तक 100 से अधिक पोलियो हेल्थ वर्कर्स को तालिबान मार चुका है. तालिबान पोलियो की वैक्सीन को पश्चिमी देशों का षड्यंत्र बताता है और मानता है कि ये उनकी नस्ल खराब करने की कोशिश है.

लाभ के लिए दुष्प्रचार

वैक्सीन के विरोध का एक और कारण है और वो ये कि कुछ संस्थाएं और डॉक्टर्स अपने लाभ के लिए वैक्सीन का दुष्प्रचार करते हैं और तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर अध्ययन के रूप में गलत तरीके से पेश करते हैं.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, ब्रिटेन के पूर्व डॉक्टर एंड्रयू वेकफील्ड. उन्होंने वर्ष 1998 में एक शोध पेश किया था, जिसमें ये दावा किया गया था कि Measles की बीमारी बच्चों को Autism Spectrum Disorder से पीड़ित कर रही है. ये एक तरह का मानसिक रोग है.

इस अध्ययन पर उस समय कई देशों ने विश्वास किया लेकिन बाद में पता चला कि ये स्टडी गलत थी. इसके बाद ही उनका मेडिकल लाइसेंस उनसे छीन लिया गया था और मेडिकल जर्नल The Lancet ने इस लेख के प्रकाशित होने के 12 वर्षों के बाद फिर से एक नया लेख लिख कर उनके दावों की पोल खोली थी.

कहने का मतलब ये है कि वैक्सीन को लेकर इस तरह के झूठे अध्ययन भी गढ़े जाते हैं और आपको पता भी नहीं चलता.

यानी वैक्सीन को लेकर विश्वास की कमी का एक लम्बा इतिहास है. लेकिन बड़ी बात यही है कि वैक्सीन ने हमेशा से लोगों की जान बचाई है. आज हमने वैक्सीन को लेकर डर से संक्रमित लोगों पर एक रिपोर्ट तैयार की है. हम चाहते हैं कि आप इन लोगों की बातों को ध्यान से सुनें और समझें कि वैक्सीन को लेकर हमारे देश में कितनी अफवाहें फैली हुई हैं.

पूरी दुनिया में वैक्सीन को लेकर अफवाह

 

ऐसा नहीं है कि वैक्सीन को लेकर भारत में ही डर और अफवाह फैली हुई है. पूरी दुनिया में इसका असर है. इंटरनेट पर अलग अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर की गई एक स्टडी के मुताबिक, इस समय वैक्सीन को लेकर सबसे ज्यादा अफवाह भारत में नहीं, बल्कि अमेरिका में हैं.

इस स्टडी में जो अफवाह इकट्ठा की गईं, उनमें से 15 प्रतिशत अकेले अमेरिका से संबंधित थीं. दूसरे नंबर पर भारत है, जहां पर ये आंकड़ा 13 प्रतिशत है, जबकि 12 प्रतिशत के साथ ब्राजील  तीसरे स्थान पर है. ये स्टडी साइंस जर्नल ने मई 2021 में प्रकाशित की है. इस अध्ययन से आप समझ सकते हैं कि कैसे वैक्सीन की अफवाह लोगों को डरा रही है.

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