Explainer: भारत में अंग दान करने वालों और जरूरतमंदों की संख्या में बड़ा अंतर, ये आंकड़े बता रहे जमीनी हकीकत

नई दिल्ली: रन फिल्म में विजय राज का वो सीन तो आपको याद होगा जिसमें वह रोते हुए बोलते हैं कि, सिर का इलाज बोलकर किडनी निकाल ली. इसी तरह अंधाधुन फिल्म का किरदार भी खुद को किडनी चोरों से बचा रहा होता है क्योंकि डॉक्टर और उसके साथियों को किसी अमीर आदमी के लिए किडनी की जरूरत है. इसी तरह ट्रैफिक फिल्म में मनोज बाजपेयी भारी यातायात से बचाकर एक मृतक का दिल लेकर जाते हैं ताकि उसका प्रत्यारोपण हो सके. फिल्मों में कभी कॉमेडी के बहाने, तो कभी गंभीर विषय के तौर पर, कभी अंगों की तस्करी के विषय के तौर पर तो कभी मानवता को आधार बनाकर अंगों के प्रत्यारोपण की जद्दोजहद को दर्शाया जाता रहा है. जो यह बताता है कि अंग प्रत्यारोपण की देश में लगातार मांग बढ़ती जा रही है.

हालांकि भारत में पिछले 7 सालों में अंग दान की संख्या में कम से कम 50 फीसद की बढ़ोतरी देखने को मिली है, लेकिन तमाम तरह के डेटा बताते हैं कि मरीजों की संख्या में भी उतनी ही तेजी से इजाफा हुआ है. ऐसे में अंग दान की संख्या बढ़ने के बावजूद हम पिछड़े हुए हैं. ऑर्गन इंडिया का डेटा बताता है कि भारत में अंग दान को ज्यादा स्वीकृति मिल रही है लेकिन दान की तुलना में प्रत्यारोपण में भी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. मसलन भारत में अंग प्रत्यारोपण गतिविधि में 77 फीसद का उछाल आया है. 2014 में जहां इसकी संख्या 6916 थी, वहीं 2021 तक यह बढ़कर 12,259 पहुंच गई है. इसमें किडनी, लिवर, दिल, फेफड़े, पैंक्रियाज और छोटी आंतों का प्रत्यारोपण शामिल है.

वहीं इसकी तुलना में मृत व्यक्तियों के अंग दान के आंकड़े जहां 2014 में 1030 थे वो पिछले साल 57 फीसद तक बढ़कर 1619 दर्ज किए गए (इन आंकड़ों में किडनी या लिवर का दान देने वाले जीवित दाताओं की संख्या शामिल नहीं है). अंगदान और प्रत्यारोपण दोनों की संख्या में वृद्धि हुई है और मांग-आपूर्ति में एक बड़ा अंतर बना हुआ है.  ऑर्गन इंडिया की चेयरपर्सन अनिका पाराशर ने न्यूज 18 को बताया कि, भारत में उपलब्ध अंग और ऐसे मरीज जिन्हें प्रत्यारोपण की जरूरत है उसके बीच बहुत बड़ा अंतर है.

पाराशर का एनजीओ राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) के तहत भारत में अंगदान के मुद्दे पर काम करने वाली अहम इकाई है. विविधता लिए हुए भारत को लेकर अनिका पाराशर का मानना है कि अंग दान को लेकर यहां अज्ञानता और हिचकिचाहट के अलावा धार्मिक और अंधविश्वास सहित कई मुद्दे हैं. अनिका पाराशर ने कहा कि कई बार ऐसा होता है कि मरीज ने अपने अंग दान के लिए शपथ ली हुई होती है लेकिन उसके जाने के बाद परिवार मना कर देता है. हालांकि जब मरीज ब्रेन डेड हो जाता है तो उसके बाद उसके लौटने का कोई मौका नहीं होता है. लेकिन फिर भी हजारों ब्रेन डेड मरीजों के अंग दान के लिए नहीं दिए जाते हैं. जबकि एक साधारण प्रक्रिया कई मरीजों को जिंदगी जीने का दूसरा मौका दिला सकती है. 

आंकड़ों का खेल

स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) की वेबसाइट पर सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब हर साल करीब 1.8 लाख लोग किडनी की खराबी से पीड़ित होते हैं. वहीं प्रत्यारोपण की संख्या महज 6000 है. इसी तरह एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल करीब 2 लाख मरीज लिवर की खराबी या लिवर कैंसर की वजह से मर जाते हैं. भारत में हर साल करीब 25,000 से 30,000 लिवर प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है लेकिन होते केवल 1500 ही हैं. ऐसे ही 50,000 लोग हर साल दिल की बीमारी से पीड़ित होते हैं लेकिन हर साल दिल प्रत्यारोपण की संख्या मात्र 10 से 15 है. 

ऑर्गन इंडिया की अनिका पाराशर का कहना है कि अंग दान और प्रत्यारोपण के बीच के अंतर का सही आंकड़ा देना तो मुश्किल है लेकिन एक अनुमान के मुताबिक हर साल करीब 5 लाख लोग अंगों की खराबी से पीड़ित होते हैं और जिंदगी बचाने के लिए जो अंग दान का आंकड़ा है वह इसकी तुलना में महज 3 फीसद है. 

महिला बनाम पुरुष दाता

ऑर्गन इंडिया का लिंग आधारित खुद का तो कोई डेटा नहीं है लेकिन इन्स्टिट्यूट ऑफ किडनी, डिसीज एंड रिसर्च सेंटर के डॉ. विवेक कुटे का शोध बताता है कि भारत में हुए 12,625 प्रत्यारोपण में से 72.5 फीसद अंग प्राप्त करने वाले पुरुष थे. पिछले 20 सालों का आकलन बताता है कि 75-80 फीसद जीवित दाता महिलाएं थीं और उनको ग्रहण करने वाली इतनी ही संख्या पुरुषों की थी.  

अनिका कहती हैं कि ऐसे में सवाल यह है कि क्यों कम महिलाओं को अंग प्राप्त करने के योग्य माना जाता है और पुरुषों की तुलना में जीने का दूसरा अवसर दिया जाता है. यह एक ऐसा सवाल है जो एक भारतीय समाज के रूप में हमारी सोच को दर्शाता है. दरअसल यह एक कड़वी हकीकत है कि हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम अहमियत दी जाती है. इसी तरह जीवित महिलाओं के ज्यादा अंग दान करने के सवाल का जवाब देते हुए अनिका कहती हैं कि,अपने पति से संवेदनात्मक नाता, आर्थिक स्थिति (कई परिवारों में पुरुष ही अकेला कमाऊ है), और पति की मौत पूरे परिवार को मुश्किल में डाल सकती है जैसे सवाल महिलाओं को अंग दान करने के लिए प्रेरित करते हैं. 

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तंत्र की चुनौती

अनिका पाराशर का मानना है कि वर्तमान में जो सिस्टम काम कर रहा है, उसमें एक दूसरे के साथ कोई नाता नहीं है. जहां एक तरफ अपने अंगों को दान करने की शपथ लेने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है, तब भी हम अन्य देशों से प्रत्यारोपण के मामले में पिछड़ रहे हैं. इसके लिए हमें देश के अस्पतालों और शहरों में अधिक से अधिक जागरूकता और कुशलता लाने की जरूरत है. इसके साथ ही अधिकारियों, पुलिस, चिकित्सा तंत्र, परिवार के बीच में एक बेहतर तालमेल बनाया जाना चाहिए और हो सके तो इसमें कानून व्यवस्था को भी शामिल किया जाना चाहिए. 

कुल मिलाकर अंगोंं को हासिल करने के बाद उसका मिलान और सही प्राप्तकर्ता तक पहुंचाने की प्रक्रिया बहुत कठिन और लंबी होती है. ऐसे में जनता और चिकित्सा क्षेत्र में जागरूकता का होना ही अहम है. टियर 1 और 2 श्रेणी के शहरों में तो ब्रेन डेथ कमेटी का गठन किया जाना चाहिए जिससे प्रत्यारोपण की प्रक्रिया ज्यादा सहज हो सके.  इसके अलावा अस्पतालों में उचित प्रशिक्षण और सहयोग इस प्रक्रिया को सहज और सरल बना सकता है. इसके लिए एक स्थापित अस्पताल दूसरे अस्पताल का हाथ थामकर कई केंद्र स्थापित कर सकता है. 

अनिका पाराशर बताती है कि हमने परिवारों की मदद के लिए 24X7 हेल्पलाइन सेवा स्थापित की है, जहां दान और मार्गदर्शन से जुड़ी सहायता दी जाती है. अनिका पाराशर  का दावा है कि हमें हर महीने करीब 250 कॉल आती हैं और हमारी टीम नेत्र और शरीर दान को लेकर समन्वय स्थापित करती है.

Tags: Health bulletin, Organ Donation, Organ transplant

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