Gadbhoj Uttarakhand: पहाड़ी संस्कृति की अनूठी परंपरा है 'गढ़भोज', जानें कैसे और क्‍यों हुई शुरुआत?

देहरादून. उत्तराखंड बनने के बाद राज्य को एक अलग पहचान मिली है. वहीं, उत्तराखंड के खानपान को पहचान दिलाने के लिए गढ़भोज अभियान शुरू किया गया था. साल 2000 से गढ़भोज अभियान के प्रणेता द्वारिका प्रसाद सेमवाल लगातार पहाड़ी उत्पादों से युवा और बच्चों को जोड़कर पहाड़ी खानपान को मेनस्ट्रीम में लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं.

News 18 लोकल से बातचीत के दौरान द्वारिका प्रसाद सेमवाल ने कहा कि राज्य के पारंपरिक भोजन को पूरे देश में “गढ़भोज” के नाम से पहचान दिलाकर थाली का हिस्सा बनाने और आर्थिक मजबूती का जरिया बनाने के लिए हिमालय पर्यावरण जड़ी बुटी एग्रो संस्थान जाड़ी साल 2000 से राज्य मे गढ़भोज अभियान चला रही है. वास्तव में उत्तराखण्ड का पारम्परिक भोजन दुनिया के चुनिंदा भोजन में से है, जो पेट भरने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक होता है. साथ ही कहा कि यह हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.

सेमवाल के मुताबिक, पहाड़ की फसलें पारिस्थितकी तंत्र मे संतुलन बनाये रखने मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश ये फसलें और उनसे बनने वाले भोजन कुछ साल पहले हाशिए पर चले गये थे, जो फिर धीरे-धीरे हमारी थाली का हिस्सा बन रही हैं. विवाह समारोह, सामुदायिक आयोजनों और प्रशासनिक बैठकों में पहाड़ी खानपान का चलन फिर शुरू हो गया है. द्वारिका प्रसाद सेमवाल का मानना है कि गढ़भोज अभियान के लम्बे संघर्षों और सरकार की कोशिशों से आज धीरे-धीरे फसलों के उत्पादन बढ़ाने पर काम किया जा रहा है.

इसी के साथ ही बेहतर बाजार व्यवस्था की कोशिश भी जारी है जिसे सबको मिलकर और बेहतर करने की जरूरत है. उत्तराखंड की पारम्परिक फसलें और उससे बनने वाले गढ़भोज की खूबिया व सरक्षण को लेकर राज्यवासी सम्पूर्ण राज्य व राज्य से बाहर एक दिन उत्सव के रूप मे मनाए, इसके लिए जाड़ी संस्थान गढ़भोज दिवस मना रही है. इस उत्‍सव में स्कूली बच्चों को पहाड़ी व्यंजन परोसने की मुहिम चलाई जा रही है.

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FIRST PUBLISHED : January 02, 2023, 18:41 IST

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