Legal Explainer: संविधान का बेसिक ढांचा लोकतंत्र और गणतंत्र का ध्रुव तारा

भारत को 15 अगस्त, 1947 को आजादी मिली, जो स्वतंत्रता दिवस है. उसके तीन साल बाद 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हुआ, जिसे हम गणतंत्र दिवस के तौर पर मनाते हैं. संविधान में स्त्री-पुरुष को समान मानते हुए, सभी बालिग लोगों को मताधिकार मिला. उसके अनुसार सन् 1952 में पहले आम चुनाव हुए, जिसके बाद सही अर्थों में भारत में लोकतंत्र की स्थापना हुई.

जजों की नियुक्ति के सिस्टम पर मंत्री और जजों के बीच विवाद चल रहा है. दूसरी तरफ विधायिका यानि विधानसभा और लोकसभा के पीठासीन अधिकारी न्यायपालिका के अतिक्रमण पर चिंता जाहिर कर रहे हैं. उनके अनुसार विधायिका सर्वोच्च है, क्योंकि उसे कानून बनाने का अधिकार है. उपराष्ट्रपति धनखड़ ने जनता द्वारा चुनी गई सरकार और संसद की सर्वोच्चता की बात कही है. इस बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट के मुखिया जस्टिस चन्द्रचूड़ ने संविधान के बेसिक ढांचे को ध्रुव तारे की तरह बताया है. बेसिक ढांचे की मनमौजी व्याख्या के बीच आम लोग भी इसे समझें तो गणतंत्र के साथ लोकतंत्र भी मजबूत होगा.

इंदिरा सरकार के संविधान संशोधन

संविद् सरकारों के दौर में इंदिरा गांधी ने विपक्ष को परास्त करने के लिए कई लोक-लुभावन कार्यक्रम लागू किए. बैंकों का राष्ट्रीयकरण और राजा-महाराजाओं का प्रिवी पर्स यानि पेंशन खत्म करने के साथ उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा दिया. पाकिस्तान की हार और 1971 में बांग्लादेश के उदय के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता बढ़ गयी थी. आम चुनावों में लोकसभा में 540 में से 350 सीटें मिलने से इंदिरा के पास अभूतपूर्व बहुमत भी था. इसलिए कानूनों में बदलाव और संविधान में कई संशोधन करने में उन्हें कोई अड़चन नहीं आई. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने केशवानन्द भारती मामले में ऐतिहासिक फैसला देकर सरकार और संसद की लक्ष्मण रेखा तय कर दी.

संविधान के 24वें संशोधन से संसद को सर्वोच्च शक्ति

नेहरु सरकार ने सन् 1951 में पहले संविधान संशोधन से अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित किया था. उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा गया कि यह संविधान के भाग-3 का उल्लंघन करता है. शंकरी प्रसाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन को वैध ठहराते हुए कहा कि संसद को संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की शक्ति है. लेकिन उसके बाद गोलकनाथ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के भाग-III यानि मूल अधिकारों में कोई बदलाव नहीं हो सकता.

फैसले के अनुसार अनुच्छेद-368 में दी गई शक्ति के इस्तेमाल से संविधान के सभी हिस्सों का संशोधन नहीं किया जा सकता. इस फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए इंदिरा सरकार ने संसद से 24वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित कराया. उसके अनुसार संसद को संविधान में संशोधन की पूर्ण शक्ति हासिल है. लेकिन ऐसे कानूनों पर राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी है. केशवानंद भारती मामले में वर्ष 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने 24 वें संविधान संशोधन को वैध ठहराया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान संशोधन से संविधान का मूल ढांचा यानि बेसिक स्ट्रक्चर नहीं बदला जा सकता.

केशवानंद भारती मामले में बेसिक स्ट्रक्चर का सिद्धांत

यह मामला केरल सरकार के खिलाफ था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों ने 703 पेज का फैसला दिया. मुख्य मामले में केशवानंद भारती केरल सरकार के खिलाफ हार गए, जब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के 29वें संशोधन को वैध ठहराया. संविधान में कहीं भी बेसिक ढांचे शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ और यह केशवानंद मामले में सुप्रीम कोर्ट की ईजाद है. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान को जीवित दस्तावेज बताते हुए संशोधन के माध्यम से बेसिक ढांचे को बदलने की संसदीय शक्ति से इंकार किया. फैसले के अनुसार संघीय व्यवस्था, केंद्र और राज्य के बीच में शक्तियों का विभाजन, संसदीय प्रणाली, भारत की एकता और अखण्डता, मूल अधिकार और संविधान की सर्वोच्चता जैसे मामलों में संसद को संशोधन करने की शक्ति नहीं है. उसके बाद कई दूसरों फैसलों में बेसिक ढांचे के कुछ और पहलुओं को शामिल किया गया.

सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसले

सुप्रीम कोर्ट ने मिनर्वा मिल्स मामले में 1980 के फैसले से न्यायिक पुनरावलोकन यानि संसद से पारित कानून पर अदालतों को सुनवाई के अधिकार को भी बेसिक ढांचे के तहत शामिल कर लिया. इंदिरा साहनी मामले में 1992 में कानून के शासन यानि रुल ऑफ़ लॉ को बेसिक ढांचा माना गया. सन् 2015 में संविधान बेंच ने कालेजियम सिस्टम को भी बेसिक ढांचा मानते हुए NJAC कानून को निरस्त कर दिया. निश्चित तौर पर संविधान के अनुच्छेद-50 के तहत सरकार को जजों की नियुक्ति में दखलंदाजी का अधिकार नहीं मिल सकता. लेकिन न्यायिक व्याख्या के माध्यम से लागू होने वाले कालेजियम सिस्टम को भी किस तर्क से संविधान का बेसिक ढांचा माना जा सकता है?

केशवानंद फैसले के बाद जजों की नियुक्तियों में विवाद शुरू

सरकार की तरफ से एटार्नी जनरल नीरेन डे और सीरावी ने बहस की. दूसरी तरफ से प्रसिद्ध वकील नानी पालखीवाला ने संविधान की सर्वोच्चता के पक्ष में ताकतवर दलीलें रखीं. 7 जजों ने पक्ष में और 6 जजों ने असहमति का फैसला दिया. जस्टिस एएन रे ने अल्पमत के फैसले में कहा कि संसद को संविधान में संशोधन की असीमित शक्ति है. चीफ जस्टिस सीकरी के रिटायरमेंट वाले दिन यह फैसला सुनाया. उनके बाद इंदिरा सरकार ने तीन वरिष्ठ जजों को नजरंदाज करते हुए जस्टिस रे को 14वां चीफ जस्टिस बनाकर उन्हें पुरस्कृत किया. न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप और वरिष्ठता को नजरंदाज करने के विरोध में तीन वरिष्ठ जजों शेलत, हेगड़े और ग्रोवर ने त्यागपत्र दे दिया. चीफ जस्टिस बनने के बाद जस्टिस रे ने केशवानंद भारती फैसले को रिव्यू के माध्यम से बदलने की कोशिश की जो सफल नहीं हो सकी.

इमरजेंसी में संवैधानिक अधिकार निलंबित

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रतिकूल फैसले के बाद आपातकाल लागू करके मूल अधिकारों को निलंबित कर दिया. इमरजेंसी के दौरान हैबियस कारपस मामले में जस्टिस खन्ना ने मूल अधिकारों और जीवन की स्वतन्त्रता को सर्वोपरि बताया. कहते हैं कि उस फैसले से नाखुश इंदिरा गांधी ने जस्टिस खन्ना को सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस नहीं बनने दिया. न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप का देशव्यापी विरोध हुआ. उसके बाद गठबंधन की सरकारों के दौर में जजों ने कॉलेजियम के माध्यम से नियुक्तियों पर एकाधिकार हासिल कर लिया, जिस पर अभी तीखा विवाद चल रहा है. इस पूरे विवाद का सबसे बेहतरीन पहलू यह है कि सभी पक्ष संविधान को सर्वोपरि मान रहे हैं. यह भारतीय लोकतंत्र और गणतंत्र की सबसे बड़ी सफलता है.

ब्लॉगर के बारे में

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 7 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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