Opinion: आदिपुरुष का विवाद- बदलाव स्वीकार न कर पाने वाले द्वंद का परिणाम

पिछले दो दिनों से मेरे सहकर्मियों और साथियों के बीच एक चर्चा बड़े जोरों पर है. रविवार को फिल्म आदिपुरुष का टीजर रिलीज हुआ है और रिलीज के साथ ही उस पर बवाल शुरू हो गया. टीजर को देखने के बाद कुछ लोगों की राय है कि ये हिंदू आस्था पर चोट है, तो किसी को लग रहा है कि उनके देवी-देवताओं और भावनाओं का मजाक बनाया जा रहा है. कोई इसे क्रिएटिविटी लिबर्टी या फ्रीडम करार दे रहा है, तो सोचा क्यों ना इस पर ही इन लोगों से बात की जाए. मैं भी इस चर्चा में कूद पड़ा, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि फिल्म पर सवाल उठाने वाले, टीजर पर चर्चा करने वाले 99 प्रतिशत लोगों को अभी फिल्म की कहानी और फिल्म में उन कैरेक्टर्स के चित्रण के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं होगी.

लेकिन उन्हें ऐतराज है तो है, ऐतराज भी फिल्म के कैरेक्टर्स के लुक पर है. दरअसल, ये पूरा विवाद है किसी भी बदलाव को स्वीकार करने या स्वीकार ना करने के बीच हमारे खुद के द्वंद्व को लेकर. अब तक रामायण के अलग-अलग किरदारों का जो वर्णन हमने अलग-अलग कालजयी ग्रंथों, कहानियों और टीवी सीरियल्स में जो देखा, पढ़ा या सुना है, उन सभी ने हमारे मन में पौराणिक किरदारों और भगवानों की छवि बनाई है, एक चेहरा उकेरा है. जिसे हम सभी ने स्वीकार किया है. और वो हमारे दिल-ओ-दिमाग में बैठा हुआ है. ऐसे में किसी नए रूप को स्वाकीर करना खासकर मुगलिया रंग रूप हो तो बर्दाश्त करना बेहद मुश्किल है.

हाल ही की एक घटना का जिक्र यहां मैं करना चाहूंगा, ट्विटर पर एक वीडियो इन दिनों खूब वायरल हो रहा है, 1980 के दशक में रामानंद सागर द्वारा बनाए गए टीवी धारावाहिक रामायण में भगवान प्रभु श्रीराम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल को एयरपोर्ट पर देखकर एक महिला उनके चरणों में बैठ गई, साष्टांग दंडवत चरण स्पर्श किए. वो महिला इतनी भावविह्ल थी कि उसके आंसू थम नहीं रहे थे और गले से आवाज नहीं निकल पा रही थी. लग रहा था मानो वो अभिनेता अरुण गोविल से नहीं बल्कि अपने प्रभु श्रीराम के दर्शन कर रही है. ठीक इसी तरह रामायण में सीताहरण करने वाले रावण या स्वर्ण लंका को जलाने वाले प्रभु हनुमान का जिक्र आते ही हमारे दिमाग में और आंखों के सामने वही चेहरे सामने आ जाते हैं, जिन्हें हमने वर्षों तक देखा है या सुना है. हनुमान चालीसा की एक चौपाई में गोस्वामी तुलसीदास हनुमान जी की रुप का वर्णन करते हुए लिखते हैं –

कंचन वरण विराज सुवेषा, कानन कुंडल कुंचित केशा

हाथ वज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेऊ साजे!!

आज तक कोई ऐसा पोस्टर या चित्र नहीं मिलता है, जिसमें बजरंगबली हनुमान का रुप इन पंक्तियों से बनने वाली छवि के अलावा कुछ और दिखता हो. भगवान श्रीराम की मूंछें दिख रही हों या फिर रावण की दाढ़ी दिखाई गई हो. तमाम तर्कों के बीच नेटवर्क 18 के मशहूर डिबेट शो आर-पार में इसी मुद्दे पर बहस के दौरान अभिनेता शहजाद खान ने तो यहां तक कह दिया कि ये पूरा विवाद सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि सैफ अली खान ने रावण की भूमिका निभाई है. इसी डिबेट में अभिनेता नासिर अब्दुल्लाह ने बेतुकी दलील देते हुए ये कहा कि उस दौर में रेजर नहीं होते थे तो वन में राम की क्लीन शेव वाली इमेज कैसे हो सकती है?

करीब पौने दो मिनट के टीजर में भगवान श्रीराम, माता सीता, लंकापति रावण, वानरराज सुग्रीव और रामभक्त हनुमान को दिखाया गया है. लोगों को ऐतराज इस बात से है कि सभी किरदार अपने मूल स्वरुप से अलग दिख रहे हैं. भगवान श्रीराम की घनी और खूबसूरत मूंछें हैं, लंकापति रावण को काली घनी दाढ़ी में, बिना त्रिपुंड ललाट के साथ क्रोधित एवं क्रूर चेहरे में दिखाया गया है. पौराणिक कथाओं में सोने की लंका फिल्म के टीजर में काली दिखाई गई है, हनुमान और रावण की पोशाक को लेकर भी लोगों का विरोध है.

इन बातों को अगर क्रिएटिविटी की कसौटी पर कसने की कोशिश की जाए तो एक अलग ही नजरिया सामने आता है. माना कि हम में से किसी ने भी आज तक भगवान श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को नहीं देखा है, हमने रावण का वास्तविक चेहरा और चेहरे पर मौजूद ओज-तेज को नहीं देखा है, हम में से किसी ने भी भगवान हनुमान के दर्शन नहीं किए हैं. लेकिन रावण के पांडित्य, ज्ञान और तेज पर किसी को कोई शक नहीं है. ना ही प्रभु श्रीराम की मर्यादा, ओज, ज्ञान, धर्मपरायणता और नीति पर कोई सवाल उठाया जा सकता है.

लेकिन, क्या फिल्मों में रावण की नकारात्मकता को दर्शाने के लिए ऐसा ही करना एकमात्र उपाय है? यहां सवाल सेंसर बोर्ड सरीखी उन एजेंसियों पर भी है, जिनके कंधों पर फिल्मों के तथ्यों की परखने की जिम्मेदारी होती है. क्या क्रिएटिविटी के नाम पर ऐसा ही कुछ किसी दूसरे धर्म के महापुरुषों के साथ ऐसा कुछ भी बदलाव करने की छूट दी जा सकती है? लेकिन, एक बार नहीं दो बार नहीं, बल्कि कई बार सनातन परंपराओं और मान्यताओं के साथ ऐसी छेड़छाड़ पहले भी हो चुकी है. अभी हाल के वर्षों में ही देखें तो वेब सीरीज तांडव में भगवान शिव का मजाक उड़ाया गया तो डॉक्यूमेंट्री काली में मां काली के स्वरुप से छेड़छाड़ की गई.

फिल्म पीके में तो सनातन धर्म पर ही चोट करने की कोशिश की गई. वहीं फिल्म ओ मॉय गॉड में सनातन धर्म के मंदिरों और पूजा पद्धति को सवालों के घेरे में खड़ा किया जा चुका है. हालांकि, एक विरोधाभास और भी है. पिछले कुछ कालखंड में हमने खुद अपने देवी-देवताओं के रौद्र स्वरुप को स्वीकार किया है. पहले भगवान श्रीराम के पोस्टर शांतचित्त धनुर्धर के रुप में होते थे, लेकिन अब भगवान ज्यादातर तस्वीरों में श्रीराम का रौद्र रुप दिखता है. प्रभु राम धनुष की प्रत्यंचा खींचे आक्रामक मुद्रा में दिखाई देते हैं. ऐसे ही रामभक्त भगवान की तस्वीर भी गुस्से वाली प्रचलित हो रही है. जो उनके रौद्र रुप को दर्शाती है. इतना ही नहीं, कथाओं में हम सुनते तो आए थे कि भगवान शिव ने रौद्र रुप दिखाया था, लेकिन आम तौर पर उनकी रौद्र रुप वाली तस्वीरें पहले नहीं दिखती थीं, लेकिन कालांतर में हमने उनके रौद्र रुप वाली तस्वीरों और पोस्टरों को भी स्वीकार कर लिया.

ऐसे ही रावण के स्वरुप को लेकर आचार्य चतुरसेन ने भी अपनी किताब वयम रक्षाम: में भी कुछ बदलाव किए थे, उन्हें भी हमने स्वीकार कर लिया. इन बदलावों को स्वीकार करने का अर्थ ये कतई नहीं होना चाहिए, सनातन धर्म और मान्यताओं को लगातार निशाना बनाया जाए. फिल्म आदिपुरुष अगले साल जनवरी में रिलीज होने वाली है, अभी सिर्फ टीजर पर विवाद बढ़ रहा है, ऐसे में हमें फिल्म का इंतजार करना चाहिए ताकि ये साफ हो सके कि क्या फिल्म में पौराणिक किरदारों के चरित्र और तथ्यों को तो नहीं तोड़ा-मरोड़ा गया है. और अंत में मुझे रामचरित मानस में लिखी गोस्वामी तुलसी दास की चौपाई का ध्यान आता है-

जिन्ह की रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी!!

रहे असुर छल छोनिप वेषा, तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा!!

ब्लॉगर के बारे में

अरुण पांडेय

अरुण पांडेयसीनियर एडिटर

अरुण कुमार पांडेय News18 चैनल में सीनियर एडिटर हैं. पत्रकारिता में 25 साल के अनुभव वाले अरुण कुमार न्यूज एजेंसी पीटीआई से करियर शुरू करने के बाद स्टार न्यूज और फिर बिजनेस चैनल सीएनबीसी आवाज़ में मार्केट एडिटर रह चुके हैं. उन्होंने Zee Business में भी बिजनेस और मार्केट एडिटर का भी पद संभाला. इसके बाद डिजिटल नेटवर्क The Quint में कंसल्टिंग एडिटर रहे. वे कुछ ऐसे चुनिंदा पत्रकारों में जिन्हें News एजेंसी, डिजिटल प्लेटफॉर्म, टीवी न्यूज़ और बिजनेस न्यूज़ जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करने का अनुभव है.

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