OPINION: क्या मध्यप्रदेश में आदिवासियों के बीच असर छोड़ पाएंगे राहुल

मध्य प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. चुनाव में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने आदिवासी वोटर को जोड़कर रखने की है. राहुल गांधी ने गुजरात की चुनावी सभा में जिस तरह से वनवासी और आदिवासी के मुद्दे को उठाया, उससे लगता है कि उनका लक्ष्य मध्य प्रदेश है. पिछले विधानसभा चुनाव में निमाड़-मालवा इलाके में मिली सफलता के कारण ही कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई थी.

मध्यप्रदेश में 21 प्रतिशत से अधिक आदिवासी आबादी है. मुख्य रूप से यह राज्य के मालवा-निमाड़ और महाकौशल क्षेत्र में है. आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित कुल विधानसभा सीटों की संख्या 47 है. राहुल गांधी की पदयात्रा मालवा-निमाड़ के जिस इलाके से गुजरेगी. वहां मुख्यत: भील, भिलाला आदिवासी हैं. कुल 66 विधानसभा सीटें हैं. हर सीट पर आदिवासी वोटर हैं. इलाके में झाबुआ कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था. 1977 की कांग्रेस विरोधी लहर का उदाहरण इसके लिए दिया जाता रहा है. लेकिन, 2019 के लोकसभा चुनाव में यह धारणा बदली कि कांग्रेस के अलावा किसी और दल का उम्मीदवार यहां चुनाव जीत नहीं सकता. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर में झाबुआ का आदिवासी भी भाजपा के पक्ष में खड़ा हुआ. राहुल गांधी और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने इस कथित गढ़ में वापसी कैसे करें? आमराय है कि राहुल गांधी की लोकप्रियता आदिवासियों के बीच उतनी नहीं है, जितनी उनकी दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी की थी. यही कारण है कि राहुल की यात्रा और उसके प्रभाव पर सबकी नजर है.

कार्यकर्ता में उत्साह लेकिन, गुटबाजी से बेहाल
मध्य प्रदेश में राहुल गांधी की पदयात्रा लगभग बारह दिन चलेगी. बहन प्रियंका गांधी भी उनके साथ होंगी. राहुल गांधी अपनी पदयात्रा में धार्मिक और सामाजिक महत्व के स्थलों पर भी जाएंगे. जाहिर है कि कांग्रेस ने पदयात्रा का मार्ग राजनीतिक लाभ-हानि को ध्यान में रखकर तय किया है. बाबा साहेब अंबेडकर की जन्मस्थली महू का कार्यक्रम 27 नवंबर का है. जबकि उज्जैन महाकाल दर्शन के लिए एक दिसंबर को जाएंगे. राहुल-प्रियंका के जरिए कांग्रेस के बड़े नेताओं की कोशिश यह है कि उनका कार्यकर्ता हताशा के माहौल से बाहर आकर चुनाव की तैयारी में लग जाए. कांग्रेस की गुटबाजी ने भी कार्यकर्ता को निराश किया है. लगता नहीं कि राहुल-प्रियंका के राज्य की सीमा से बाहर जाने के बाद भी कांग्रेस की गुटबाजी खत्म होगी. राहुल गांधी अपनी पदयात्रा के दौरान कार्यकर्ताओं से भी कोई सीधा संवाद नहीं कर रहे हैं. कांग्रेस की बड़ी समस्या भी संवादहीनता की स्थिति है. जबकि मुख्य विपक्षी दल भाजपा में हर स्तर पर अपने कार्यकर्ता से निरंतर संवाद बनाकर रखा जाता है. भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और प्रदेश प्रभारी को अपने कार्यकर्ता से संवाद करने में कोई दिक्कत नहीं होती. जबकि कांग्रेस में प्रभारी सिर्फ बड़े नेताओं से संवाद बनाकर गुटबाजी खत्म करने की कोशिश करते हैं.

चुनाव तक पदयात्रा का प्रभाव बना रहना मुश्किल
मध्यप्रदेश की चुनावी राजनीति दो दलीय है. कांग्रेस और भाजपा मुख्य राजनीतिक दल हैं. पिछले चुनाव में आदिवासी इलाकों में जय आदिवासी युवा शक्ति और गोंडवाना पार्टी के नेताओं को कांग्रेस ने साध लिया था. परिणाम यह हुआ कि निमाड-मालवा में कांग्रेस को सीधे तौर पर 29 विधानसभा सीटों का लाभ मिला था. भारतीय जनता पार्टी ने 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए इस इलाके के आदिवासी वोटर को लक्ष्य कर रणनीति अपनाई है. पिछले दो साल से भाजपा इस क्षेत्र में आदिवासियों के बीच कोई न कोई कार्यक्रम कर अपनी उपस्थिति बनाए हुए है. राहुल गांधी की पदयात्रा चंद दिन ही इस क्षेत्र में रहनी है. इससे कांग्रेस को कोई बड़ा लाभ मिल सकेगा, यह कहना मुश्किल है. वैसे भी चुनाव के लिए अभी एक साल वक्त है. तब तक यात्रा का कोई असर भी नहीं रहेगा. चुनाव के समय के तात्कालिक घटनाक्रम नतीजे बदलने में अहम भूमिका अदा करते हैं.

Tags: CM Madhya Pradesh, Madhya Pradesh Assembly, MP politics

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