Tribal News: दशकों से जो सरकारें न कर पाईं, सिर्फ 3 दिन में कर दिखाया, पढ़ें आदिवासियों की संघर्ष की कहानी

हाइलाइट्स

इन जनजातिओं ने 3 दिन में 4 km की कंटीली सड़क को किया साफ़.
अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए खुद को कर रहे शिक्षित.
बच्चों और बुनियादी अधिकारों की मांग को लेकर अक्सर चर्चा में रहते हैं.

आंध्र प्रदेश: आंध्र प्रदेश के अल्लुरी सीताराम राजू जिले के एक छोटे से दूरदराज के गांव, नीरेदु बांदा के बच्चों के लिए स्कूल जाना बहुत कठिन था. स्कूल जाने के लिए उनके 5 किलोमीटर के सफर में हर दिन 4 किलोमीटर उन्हें कांटों और झाड़ियों से भरी सड़क को पैदल चलकर पार करना होता था. बच्चों को अपने स्कूल तक पहुँचने के लिए रास्तों पर कठिनाई को देखकर गाँव के बड़े-बुजुर्गों ने उन्हें घोड़े पर बिठाकर स्कूल ले जाना और ले आना शुरू कर दिया. अंततः रोज-रोज की परेशानी को देखकर ग्रामीणों ने सड़क को दुरुस्त करने का फैसला लिया. उन्होंने 4 किमी की कटीली झाड़ियों वाली सड़क को महज तीन दिन में साफ़ कर दिया. इस गांव के 15 में से लगभग 12 बच्चे जेड जोगमपेटा में एमपी (मंडल परिषद) प्राथमिक स्कूल में पढ़ते हैं जो गांव से लगभग 5 किमी दूर स्थित है.

मंडल विकास अधिकारी सिर्फ सांत्वना देते रहे
इस गांव में महज 12 परिवार निवास करती है, जो कोंडू जनजाति के हैं. इन्हें आदिम जनजातीय समूह (PTG) या विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है. ये गांव आंध्र प्रदेश के अल्लुरी सीता रामा राजू जिले में चीमलपडु पंचायत से लगभग 16 किमी और रविकमथम मंडल से 25 किमी दूर है. इस पहाड़ी वाले गांव में सिर्फ एक ही रास्ता है और जिससे हो कर गुजरना बहुत ही मुश्किल है. गांव वालों ने मंडल परिषद विकास अधिकारी (एमडीपीओ) से बार-बार सड़क बनवाने की गुहार लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. अंततः उन्होंने मामलों को अपने हाथों में ले लिया और एक अस्थायी उपाय के तहत रास्ता साफ करना शुरू कर दिया. इसको कार्य को पूरा करने में उन्हें महज तीन दिन ही लगे. 

ब्रिटिश काल में आखिरी बार बनी थी सड़क
अनुसूची साधना समिति के जिला अध्यक्ष के गोविंदा राव ने कि वर्तमान सड़क ब्रिटिश काल में बनाई गई थी, जिसका प्रयोग कागज निर्माण उद्योगों तक बांस पहुंचने के लिए किया जाता था. समय के साथ धीरे-धीरे सड़क ख़राब होते गई और किसी भी सरकार का तरफ ध्यान नहीं गया. वहीं, एकीकृत जनजातीय विकास एजेंसियों (आईटीडीए) के अधिकारी भी बार-बार पक्की सड़क बनाने का वादा तो करते थे लेकिन उसे कभी पूरा नहीं कर पाए तो ग्रामीणों सड़क को खुद दुरस्त करने का थान लिया, अंततः उन्होंने कर भी दिखाया.

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अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत ग्रामीण
राव ने इस गांव की खासियत बताया, ‘नीरेदु बांदा गांव अपने अधिकारों और हकों के लिए लड़ने के  लिए जाना जाता है. यहां के निवासी अपने बच्चों के बेहतर भविष्य और अवसर प्रदान करने के लिए खुद को भी शिक्षित कर रहे हैं. अभी हाल में ये गांव चर्चा का विषय बना हुआ था जब ग्रामीणों ने अपने बच्चों को स्कूलों में दाखिला के लिए डीएम से मिलकर उनसे आधार कार्ड बनवाने की मांग की और वे उसमें सफल भी हुए.’

Kondu Tribe, Andhra Pradesh

बुनियादी जरूरतों जैसे गांव में स्कूल, अस्पताल और साफ़ पानी की मांग के लिए अर्धनग्न होकर विरोध करते कोंडू जनजाति. (फोटो-वीडियो ग्रैब)

ग्रामीण का भावुक अपील 
गांव के निवासी डिप्पल्ला अप्पलराव ने एक वीडियो के माध्यम से सन्देश/पूछते हुए कहते हैं, ‘हमारे गाँव के बच्चों को रोजाना स्कूल जाने पहाड़ी पथरीली और कटीली 5 किमी की सड़क को पार करना होता है, जिसे पार करना बड़े लोगों के लिए भी मुश्किल है. बच्चों की दिक्कतों को देखते हुए हम ग्रामीणों ने कुछ पैसे इकट्ठा कर उससे घोड़े ख़रीदे. हम रोज बच्चों को रोज सुबह स्कूल ले जाते हैं, दिनभर वहीं रूककर शाम को उन्हें वापस घर लाते हैं. लेकिन, क्या हमें अपने बच्चों को स्कूल ले जाना चाहिए या अपनी रोटी कमाने के लिए काम करना चाहिए?’

Tags: Andhra pradesh news, Tribes of India

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